शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

गधे पर सवार सियासत ,,,,,,,,

बनखेड़ी( योगेश शर्मा)- गधा शब्द सुनते ही दो बातें दिमाग में आती हैं एक मूर्खता और दूसरी वफादारी। इन दिनों उत्तरप्रदेश के घमासान में जिस तरह "गधा"
सुर्खियों में आया हैं। इतिहास गवाह है इस प्रजाति को इतनी इज्जत नही बख्शी गई। दुर्भाग्यवश जिस तरह कोई खुद को गधा बताकर प्रजा के प्रति नतमस्तक हैं तो कोई गधे को मूर्खता की प्रासंगिक व्याख्या कर रहा हैं। दोनों ही स्थितियों में हर कोई सियासी लाभ लेने भाषा के सबसे निचले स्तर से सत्ता के नजदीक पाने आमदा हैं। जनता पारम्परिक लोकतंत्र के पर्व में स्वयं को मिलती क्षणिक तव्वजो से खुश हैं। खुश होना भी चाहिए इससे ज्यादा उसके वश में कुछ भी नही हैं। जो लोग कभी सत्ता के शीर्ष से आम आदमी के दर्द को महसूस नही कर सकें वे क्षण भर में कायनात बदलने की बाते मंच से चुटकियां लेते हुए कर रहें हैं।

सवाल इतना भर नही हैं कि किस गधे को चुना जाएं। सवाल तो यह हैं कि क्या गधा राष्ट्र रुपी मालिक के प्रति वफादार हैं ? गधे के स्वाभाव में कपट,छल,वादाखिलाफी नही होती। यह भले ही बेसुरा हैं लोगों के लिए मूर्खता का पर्याय हैं पर इतना जरूर समझिए गधे को सही दिशा में बढ़ने और गड्ढे से निकलने की समझ ईश्वरीय देंन हैं। तो फिर क्या मायने निकाले जाएं और किस गधे पर जनमानस भरोषा जताये। सियासी मायने में गधा इसके मूल स्वभाव,गुणों ,सादगी में बिलकुल अलग हैं। सियासी  गधा तो बेहद चतुर,चालाक,सुरीला,मधुर,छलिया,आत्मप्रसंसी हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

मेरा गावँ मेरा तीर्थ,,,,,संकल्पना स्वागत योग्य हैं पर,,,

संघ प्रमुख की चेतावनी न हो नेतागिरी,कल्पना बनकर न रह जाएं संकल्पना
जिसने आधुनिकता से जोड़ने थामा हाथ उसी के हो लिए आदिवासी

बनखेड़ी ( योगेश शर्मा)- मेरा गावँ मेरा तीर्थ संकल्पना बेहद अच्छी कल्पना हैं पर भागवत जी के आगमन उपरांत यह जमीन पर गति पकड़ेगी। क्योंकि जिस अंदाज में सर संघ चालक मोहन भागवत ने चेताया कि नेतागिरी की तरह न हो ग्राम उत्थान,बहुत कुछ असलियत जताता हैं। जल,जंगल,जमीन,जानवर की हालत इन दिनों क्या हैं इस का इशारा भी उन्होंने किया। केंद्र और राज्य में सत्ता सीन समकालीन सरकार के होते हुए भी नदी में रेत का अवैध उत्खनन,जंगलों की अवैध कटाई,जमीन के लिहाज से फसल बीमा की हकीकत, गौ वंश के अवैध धंधे इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहें हैं। जिस नेतागिरी का जिक्र कर उन्होंने चेताया वह भी चिंतनीय विषय हैं। रोडो के गड्ढे बीते दो वर्षों में आम आदमी के लिए नही भरे गये पर संघप्रमुख के आगमन पूर्व रातों रात रोड के गड्ढे भरना दिखावे की इस नेतागिरी और विकास के मॉडल की कलई खोलने काफी।

धर्मांतरण क्यों ?

जिस गावँ को तीर्थ का दर्जा देने यह संकल्पना की गई हैं सन्देह नही की आम जनमानस इसे नही अपनाएगा। पर यदि यह अभियान भागवतजी के आगमन के बाद फीका पड़ा तो आम जनमानस चाहकर भी इस अभियान से नही जुड़ सकेगा। सक्षम,न्यास का गृह नगर बनखेड़ी विकास से कोसों दूर खड़ा हैं यह साफतौर पर नजर आता हैं। ट्रेन स्टापेज,झिरपा मार्ग अगर समय रहते दिया जाता तो आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की कवायद धर्मांतरण पर लगाम लगाने कारगर हो जाती। स्वास्थ्य,शिक्षा,रोजगार के आभाव में आदिवासी खुद भूल चुके है कि उनका अपना हैं कौन शायद वजह भी यही हैं चुनावी समर में याद आने वाला आदिवासी उसी के हो लिये जिसने इसे लालच देकर आधुनिकता से जोड़ा। क्षेत्र के तालाब जनसहयोग और श्रमदान के बाद प्रशासन की नींद नही तोड़ सकें शायद अब मेरा गावँ मेरा तीर्थ परिकल्पना के जरिये सँवर जाएं।
जमीन से दूर मॉडल-
धान का कटोरा कहा जाने वाला पलिया पिपरिया धान की उन्नत खेती के लिए जाना जाता हैं। जिस जैविक पद्धति का जिक्र जब संघ प्रमुख ने किया तो विचार में आदर्श नजर आने वाला जैविक संकल्प सवाल खड़े कर गया कि जहां बिजली,पानी के लिए आज भी गावँ में महज 6 घण्टे बमुश्किल हो जबकि कई गावँ तो पीने के साफ़ पानी को मोहताज हो तो कल्पना कीजिये फिलहाल हम कहाँ खड़े हैं। जैविक कृषि आदर्श हैं पर इसे बढ़ावा देने मुट्ठी भर जमीन के मालिक छोटे किसानों को प्रेरित किया जाएगा या सक्षम बड़े किसान जो स्वयं संसाधनों से परिपूर्ण है वही आदर्श बनेंगे। बहुतेरे सवाल है। आदिवासी अंचल ङोलनी जाकर इसे समझना पहली आवश्यकता हैं। बीते दिनों बाचावानी में दूषित पानी पीने से हुई मौत भी हमारे विकास की कलई खोलती रही हैं। मेरा गावँ मेरा तीर्थ बेशक क्षेत्र को मॉडल बना दे पर आशंका हैं यह ओल नदी पर हुए श्रमदान,अर्थदान,प्रदेश में ख्याति पाने के बाद सालभर में अपने बदहाल और निर्जीव होने परंपरागत उपेक्षा का शिकार की तरह गुमनाम न हो जाए। इंतजार करना होगा ग्राम के तीर्थ बनने तक।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

बनखेड़ीbkh को रात्रीकालीन ट्रेन न देने पर शुभकामनाएं।

बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- एक वर्ष के हर संभव संघर्ष के बाद बनखेड़ी हार गई और रेल प्रशासन की अनदेखी और हमारे जनप्रतिनिधियों की खामोशी आखिरकार जीत गई। युवा संघर्ष आखिरखार उन हालातों में राजनीति की कुटिल चालों से कैसे पार पाता। हमने आंदोलन का रास्ता न चुनकर विनम्रता को अपनाया पर शायद हम गलत थे। चुनावी मुहूर्त के समय ही आम आदमी की वेदना को सुनकर उसपर श्रेय का पॉलिस चढ़ाकर मुद्दा बनाये जाने की परंपरा आज भी बरकरार हैं। हमारे क्षेत्र में राजनीतिक मानसिकता का खूंटा इस कदर हावी हैं कि बनखेड़ी का अवरुद्ध विकास बहुत पीछे छूट गया।  मौसमी राष्ट्रधर्म के बादलों में युवा इस कदर उलझे की उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य की बेशाखियां जकड़ने लगी।

अब आलम यह हैं कि राजनीतिक नजरिया रखने वाले क्षेत्र के कर्णधार बेहद खुश हैं क्योंकि ट्रेन स्टापेज के मुद्दे पर उन्होंने बड़े ही अनुशासन से खामोश होकर इस मुद्दे को अपनी मुट्ठी में कर लिया। जब हमारे अपने ही जनप्रतिनिधि ट्रेन स्टॉपेज के मुद्दे पर असहज हो तो यकीन करना आसान हैं जबलपुर रेल मंडल की नजरों में तो बनखेड़ी नगर परिषद मुख्यालय जिससे 1.50 लाख आबादी जुड़ी हैं वो आज भी गुमनाम रेलवे स्टेशन हैं। मुझ जैसे बहुत से युवा आज सवाल उठाते हैं " ट्रेन स्टापेज का क्या हुआ" इस युवा जोश को कौन समझाए की ट्रेन स्टापेज के लिए उग्र आंदोलन ही ऐसा जरिया है जब बेसुध रेल प्रशासन सुध लेता हैं। पर यह भी समझना होगा की जिस क्षेत्र के प्रतिनिधि चुप,जिम्मेदार चुप ऐसे में आंदोलन जेंसे असंवैधानिक रुख से उन युवाओं का केरियर भी दागदार किया जा सकता है जिससे उनका भविष्य रेल विभाग के कानून तले दफन भी किया जा सकता हैं। यह राजनीति हैं,यहां विकास की चिंता किसे हैं?

गुस्सा भी आता हैं,सिस्टम की चुभन भी होती हैं पर संघर्ष और लड़ाई तब लड़ी जा सकती है जब यह गुस्सा सार्वजनिक हों। बनखेड़ी जेंसे क्षेत्र भी उदाहरण है विनम्रता का जिस पर खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं। प्रतिनिधित्व का आभाव इतना की भेड़ चाल चलने भी तैयार है। हालातों से समझौता करना बनखेड़ी  के संस्कार हैं। हम सच्चे भारतीय हैं,जागरूक हैं समाज के प्रति,नर्मदा के पूत हैं नदियों,तालाबों,प्रकृति,धर्म,सहिष्णुता,साहस,बलिदान,जज्बा सब कुछ हैं इसलिए धैर्य का जन्म होना लाजमी हैं। अगर बनखेड़ी की जुबान होती तो जरूर कह देती मेरा इतना अपमान मत करों की मेरी तासीर भी शर्मिदा हो जाए। नर्मदा जयंती एवं बसन्तोत्सव की हार्दिक स्नेहिल शुभकामनाएं।

"पीड़ित सभी हैं कुछ कहने का साहस नही जुटा पाते कुछ बेबाकी से हकीकत को आइना दिखा जाते हैं।"

अब तक रात्रीकालीन ट्रेन न मिलने पर आप सभी को बधाई,,,,

फरवरी भी आई बसंत फिजाओं में समाई,
ट्रेन रुकने की खबर पर आज तक न आई।।

बधाई हैं बधाई हैं,सियासत के योद्धाओं बधाई,
हम हार गए प्रयाशों में, आपकी खामोशी रंग लाई ।।

क्षेत्र फिर हार गया,राजनीति की बहार आई हैं,
ये  नपुंसक सम्मान हैं,आपको फिर बधाई हैं।।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी,,,

नर्मदा तेरे यशगान से जरूरी हैं तेरा वर्तमान लिंखु,,,

*हे माँ नर्मदा*

आस्था बहुत है,अब संरक्षण  सा- आगाज़ हैं,
जीवनदायनी नर्मदा  अब साँसों की मोहताज है।।

सिमटने लगा है नर्मदा का इस कदर आँचल,
पुण्य- सलिला माँ देख रही है खामोश हलचल।।

सतपुड़ा के घने जंगलों से आती ये सहायक नदियां,
बेजान बुत बन गईं बदहाल,निःशक्त,लाचार नदियां।।

रेत के सौदागर ख़ंजर चला रहें हैं माँ के सीने पर,
हम भीड़ हैं,भक्त हैं,प्यासे हैं,निर्भर हैं तेरे जीने पर।।

हे माँ सुना हैं तेरे दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है,
तेरे चीरहरण करने वालों को क्या सजा मिलती है।।

क्या इंसानियत मृत हैं या हैवानियत का कहर है,
माँ तेरी ममता है,रौद्र रूप में न आने का असर हैं।।

नमामि देवी नर्मदे अब तेरा वजूद तेरे हाथ में हैं,
दिखा अपनी शक्ति दुश्मनों का संहार तेरे हाथ में है।।

हम नही सुधरेंगे, काटेंगे उसी डाली को जिस पर सवार हैं,
तेरे निर्मल जल पर आस्था है तेरी बदहाली के हम जिम्मेवार हैं।।

रचना -
श्री योगेश शर्मा
बनखेड़ी
📞 9179064361

बुधवार, 25 जनवरी 2017

कब तक गिड़गिड़ाएं चंद लोग ट्रेन के लिए?

बनखेड़ी (योगेश शर्मा) - ट्रेन स्टॉपेज के लिए कब तक गिड़गिड़ायें भीड़ बढ़ाने और कमजोर प्रतिनिधियों की हौसला अफजाई का ठेका तो हमने ही ले रखा हैं। क्या होगा जो ट्रेन स्टॉपेज न दिया गया। क्या हुआ जिसके लिए सत्ता शासक आपकी सुध लें। जरूरत तो सिर्फ उन चंद लोगों में सिमट कर रह गई हैं जो ट्रेन स्टापेज का मुद्दा मरने नही दे रहें हैं। डर है या हकीकत जिसके चलते बड़े गर्व से भीड़ का हिस्सा बनने हर कोई तैयार खड़ा हैं। कमजोर कौन हैं बेबस लाचार भीड़ या चुनाव के वक्त रहम का टुकड़ा डालकर फोटो के सहारे जननायक बनने की चाह रखने वाले जनप्रतिनिधि ?

क्या सार्वजनिक मंच पर कहने का साहस उन जनप्रतिनिधियों का हैं जो यह कह दे प्रयास तो किये है पर रेल प्रशासन सुन नही रहा,,,,,,,,फिर कमजोर कौन हैं समझा जा सकता हैं। इतने बड़े ट्रेन स्टापेज के मुद्दे को दबाने की कोशिश कामयाब होती नजर आ रही हैं। क्योंकि चंद निजी स्वार्थों के कारण हमने भीड़ बढ़ाने की कमजोरी को सत्ताधारियों की कला में बदल दिया हैं। भावनाओं में  मौसमी देशभक्ति का चलन इस कदर बड़ा की घनघोर अंधियारे में भी क्षेत्र चमकता नजर आता हैं। भाषणों की कलाकारी ने इस कदर प्रभावित किया कि हम अपने क्षेत्र का सम्मान और हक भी भूलने लगें।

इसे दुर्भाग्य ही कहें आवाज उठाने वालों पर मानसिकता का पर्दा होने का आरोप लगाकर उन्हें ही कटघरे में खड़ा करने से भी नही चुके। रेवेन्यू हैं,क्षेत्र का बड़ा रकवा हैं,महती जरूरत है,आम जनमानस की बुनियादी जरूरत से जुड़ा मसला हैं। वावजूद इसके 2 मिनिट का ट्रेन स्टापेज मील का पत्थर साबित हो रहा हैं जिम्मेदार कौन ? क्या रेल विभाग अंग्रेजी हुकूमत का हिस्सा है जिसे लाखों लोगों की तकलीफ का अहसास नही या हकीकत में क्षेत्र के पास ऐसा कोई नेतृत्व ही नही जो रेल मंडल के समक्ष इस हकीकत का अहसास कराने की इक्षाशक्ति हो।  राजनीतिक भीड़ का हिस्सा बनना बताता हैं हमें अपनी शक्ति और क्षेत्र के सम्मान का अहसास नही हैं। इन मरी हुई संवेदनाओं में क्षेत्र के सम्मान की बात करना बेमानी हैं। जन आंदोलन तब बनते हैं जब अपने क्षेत्र और बस्ती की वेदना का अहसास हो,,,,,,,,,,,,चंद लोग आज नही तो कल आवाज उठाते उठाते तक जाएंगे और  हम भीड़ बनकर बर्बाद आंगन से मंजर को देखकर भी आँख मूँद लेंगे और तालिया बजाकर साबित कर देंगे हम आपके नेतृत्व से बहुत खुश हैं। आज के दौर की गणतंत्रता यही हैं।

गणतंत्र दिवस शुभ हो,,,,,,,,,,,शुभ हो,,,,,,

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

क्या प्रतिनिधित्व कही खो-सा गया हैं?

बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- सरकारें कहती हैं हम किसान,मजदूर,आम आदमी की हितैषी हैं, विपक्ष यहां तक की हर संग़ठन समाज के इन्ही तबकों के लिए लड़ रहें हैं। फिर भी आम आदमी,किसान हताश क्यों हैं? सक्षम प्रतिनिधित्व इतना कमज़ोर क्यों हैं या फिर राजनीतिक लिहाज से झूंठे संघर्ष के जरिये नेतागिरी हर कोई चमकाना चाहता हैं। सवाल बेहद सीधा हैं स्थानीय निकाय,विधायक,सांसद,राज्य सरकार,केंद्र सरकार को हमने प्रतिनिधित्व सौंपा था। यह सोचकर की हमारा और हमारी वेदनाओं को व्यक्त करने हमने प्रतिनिधि नियुक्त किये हैं। पर ये क्या हम फिर नेतृत्व विहीन होकर भटकने लगें हैं। हर उम्मीद हमसे  लगाकर सरकारें भी भीड़ में हर रोज नया शिगूफा छोड़कर भावनात्मक राजनीति करने लगी हैं।

कभी धर्म,देशभक्ति,कर्तव्य,के जरिये सरकारें खुद नेतृत्व छोड़कर आम जनमानस को नेतृत्व सौंपने की लगी हैं। वही नेतृत्व जिसमें जनता का जनता के लिए जनता द्वारा करार दिया जाता हैं पर हकीकत में उसके पास कुछ नही होता सिर्फ बार-बार प्रतिनिधि चुनकर आजमाने के अलावा। जिसे अवसर मिला उसने दोहन करके तिजोरियां भर ली,सत्ता के मद में सेवक से स्वयं सरकार बन गए। देश बदल रहा हैं क्योंकि खादी और सफेदी के मायने ही बदल गए। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का बाजारीकरण हो गया। देश तो वाकई बदल रहा हैं जहां स्पष्ट कुछ नही हैं। पर्दे के पीछे सभी किरदार एक मकसद हो चले हैं। सामने बैठे दर्शक तो किसी मनोरंजन के आदी हैं। कल सब भूलकर फिर  उसी भीड़ में खो जाएंगे जिस भीड़ की आड़ में राजनीति नस्लें रोज जन्म लेती हैं।

देश की चिंता देशभक्ति हैं पर सिर्फ मंचों पर चिंता व्यक्त कर विलासिता भरे माहौल में सरहदों की तकलीफ का अंदाजा नही लगाया जा सकता। मीडिया भी वही दिखाने लगा हैं जो नेता देखना चाहते हैं। नर्मदा और गंगा की पवित्रता पर किसी को कोई संशय नही पर इनके लगातार दोहन के दोषी कौन हैं? आत्मा को छलनी छलनी कर  कहा जाता हैं यह पवित्र हैं। लगातार रेत उत्खनन पर मै भी कुछ नही कहूँगा। चार शब्द लिखकर मै भी चिंतन व्यक्त करूँगा और सो जाऊँगा,,,,,,,,कहाँ गया प्रतिनिधित्व,कौन करेगा नेतृत्व, आम आदमी की अगुवाई की चिंता सभी को हैं पर सोच बदल गई,राजनीति बदल गई ,प्रथम पंक्ति ही कमजोर हो गई या नेतृत्व की नियत बदल गई तो देश तो बदलेगा ही। हम नही बदलेंगे क्योंकि नेत्रविहीन भीड़ तो भेड़चाल ही हैं। कोई मकसद हमारा हैं ही नही क्योंकि हम तो स्वयं सियासत का मकसद बनने अवसर बन गए हैं। नोटबंदी के मकसद कागजों पर अच्छे भी हों तो क्या फर्क पड़ता हैं जमीन पर तो अब भी आजादी पूरी नही कही जा सकती,,,,,,,,,,।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

हकीकत तो यही हैं

बरसात तो हुई हैं मगर पानी कहाँ हैं,
आँख तो रोई हैं मगर पानी कहाँ हैं।।

ठहरा हुआ हैं पानी,मगर वो बात कहाँ हैं,
बह तो रही हैं नदी,मगर वो साज कहाँ हैं।।

यूँ तो समुंदर में पानी ही पानी हैं,
प्यास किसी की बुझा दे वो बात कहाँ हैं।।

यूँ तो तन पर उजले कपड़े हैं,
मन को रौशन कर दे वो सफेदी कहाँ हैं।।

चेहरे की खूबसूरती भर काफी नही,
किसी की दुनियां संवर जाएं वो "जज्बात" कहाँ हैं।।

परिंदों की तालीम हम से अच्छी हैं,
उड़ने के बाद जमीं पर ठहरें वो इंसान कहाँ हैं।

सिर्फ नोटबंदी से कालापन नही जाएगा,
सफेदी छोड़ दे कालिख,वो सियासत कहां हैं।

यूँ तो ताजमहल बहुत अच्छे हैं,
जीते जी एक मकां मिल जाएं शाहजहाँ कहाँ हैं।।

बात में बात हो बात से बात बने,
बात सुनकर बात कहने का अंदाज कहाँ हैं।।

रचना- योगेश शर्मा,बनखेड़ी