बरसात तो हुई हैं मगर पानी कहाँ हैं,
आँख तो रोई हैं मगर पानी कहाँ हैं।।
ठहरा हुआ हैं पानी,मगर वो बात कहाँ हैं,
बह तो रही हैं नदी,मगर वो साज कहाँ हैं।।
यूँ तो समुंदर में पानी ही पानी हैं,
प्यास किसी की बुझा दे वो बात कहाँ हैं।।
यूँ तो तन पर उजले कपड़े हैं,
मन को रौशन कर दे वो सफेदी कहाँ हैं।।
चेहरे की खूबसूरती भर काफी नही,
किसी की दुनियां संवर जाएं वो "जज्बात" कहाँ हैं।।
परिंदों की तालीम हम से अच्छी हैं,
उड़ने के बाद जमीं पर ठहरें वो इंसान कहाँ हैं।
सिर्फ नोटबंदी से कालापन नही जाएगा,
सफेदी छोड़ दे कालिख,वो सियासत कहां हैं।
यूँ तो ताजमहल बहुत अच्छे हैं,
जीते जी एक मकां मिल जाएं शाहजहाँ कहाँ हैं।।
बात में बात हो बात से बात बने,
बात सुनकर बात कहने का अंदाज कहाँ हैं।।
रचना- योगेश शर्मा,बनखेड़ी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें