बनखेड़ी- ट्रेन स्टॉपेज की फिर उम्मीद जगी हैं। संघर्ष समीति ने बाजार बंद और धरने को वापस ले लिया। नगर के बुजुर्ग और जनप्रतिनिधियों की सलाह और सुझाव पर पनप रहा आक्रोश फिलहाल अचानक कम हो गया। क्योंकि उम्मीद पहले से कई गुना बड़ गई। क्षेत्र के लाखों लोग और हजारों युवाओं की भावनाओं से जुडी यह मांग कब तक पूरी होगी यह सवाल हर जहन में खड़ा हो चला हैं।
सांसद महोदय के लेटर में सोहागपुर और करेली के बीच बनखेड़ी पर रेल विभाग मेहरबान होगा या नही फिलहाल कहना मुश्किल हैं। रेलवे विभाग की नजरों में बनखेड़ी क्षेत्र की व्यापकता और आवागमन के लिहाज से आत्मनिर्भरता को तरहीज देगा। या फिर पहले से संपन्न रेलवे स्टेशनों की चकाचोंध में बनखेड़ी का अंधियारा गुम हो जाएगा ? सवाल बहुतेरे हैं। पर इतना यकीन से कहा जा सकता हैं की अब अगर नही सुना गया तो हजारों युवाओं के आक्रोश से रेल विभाग को दो दो हाथ तो करने ही होंगे। एक हद तक विनम्रता को कमजोरी समझने की भूल दुगने आक्रोश को जन्म देती हैं। वैसे भी समय सीमा की बात करें तो हर लिहाज से बनखेड़ी क्षेत्र की ओर से दिया जा चुका हैं। ऐसे में एक और उम्मीद टूटना न्यायसंगत नही हैं। रेल विभाग के मुखिया बनखेड़ी की जरूरत को भले ही न समझें पर जनप्रतिनिधियों को अच्छी तरह से मालूम हैं की यह मुद्दा अब कमजोर नही होगा। बल्कि समय रहते परिणाम न आने पर यह मुद्दा सड़को पर आक्रोश बनकर उतर सकता हैं। क्योंकि सत्ता से जुडी मानसिकता हो या विपक्ष ट्रेन स्टॉपेज के समर्थन में खड़े हैं। हर युवा कब तक मन समझाएगा,कब तक किसी विचारधारा के साथ भीड़ का हिस्सा बनेगा। खेर यह सब सोचकर मनोबल क्यों तोड़ा जाए जबकि हर आम युवा ट्रेन स्टॉपेज की अधिकृत घोषणा की राह बड़ी बेसब्री से देख रहा हैं। उम्मीद भी यही हैं की यह सौगात 2016 के जाते जाते ही सही इस साल को यादगार बना दे।
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
क्या फिर विनम्रता रंग लाएगी?
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