संघ प्रमुख की चेतावनी न हो नेतागिरी,कल्पना बनकर न रह जाएं संकल्पना
जिसने आधुनिकता से जोड़ने थामा हाथ उसी के हो लिए आदिवासी
बनखेड़ी ( योगेश शर्मा)- मेरा गावँ मेरा तीर्थ संकल्पना बेहद अच्छी कल्पना हैं पर भागवत जी के आगमन उपरांत यह जमीन पर गति पकड़ेगी। क्योंकि जिस अंदाज में सर संघ चालक मोहन भागवत ने चेताया कि नेतागिरी की तरह न हो ग्राम उत्थान,बहुत कुछ असलियत जताता हैं। जल,जंगल,जमीन,जानवर की हालत इन दिनों क्या हैं इस का इशारा भी उन्होंने किया। केंद्र और राज्य में सत्ता सीन समकालीन सरकार के होते हुए भी नदी में रेत का अवैध उत्खनन,जंगलों की अवैध कटाई,जमीन के लिहाज से फसल बीमा की हकीकत, गौ वंश के अवैध धंधे इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहें हैं। जिस नेतागिरी का जिक्र कर उन्होंने चेताया वह भी चिंतनीय विषय हैं। रोडो के गड्ढे बीते दो वर्षों में आम आदमी के लिए नही भरे गये पर संघप्रमुख के आगमन पूर्व रातों रात रोड के गड्ढे भरना दिखावे की इस नेतागिरी और विकास के मॉडल की कलई खोलने काफी।
धर्मांतरण क्यों ?
जिस गावँ को तीर्थ का दर्जा देने यह संकल्पना की गई हैं सन्देह नही की आम जनमानस इसे नही अपनाएगा। पर यदि यह अभियान भागवतजी के आगमन के बाद फीका पड़ा तो आम जनमानस चाहकर भी इस अभियान से नही जुड़ सकेगा। सक्षम,न्यास का गृह नगर बनखेड़ी विकास से कोसों दूर खड़ा हैं यह साफतौर पर नजर आता हैं। ट्रेन स्टापेज,झिरपा मार्ग अगर समय रहते दिया जाता तो आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की कवायद धर्मांतरण पर लगाम लगाने कारगर हो जाती। स्वास्थ्य,शिक्षा,रोजगार के आभाव में आदिवासी खुद भूल चुके है कि उनका अपना हैं कौन शायद वजह भी यही हैं चुनावी समर में याद आने वाला आदिवासी उसी के हो लिये जिसने इसे लालच देकर आधुनिकता से जोड़ा। क्षेत्र के तालाब जनसहयोग और श्रमदान के बाद प्रशासन की नींद नही तोड़ सकें शायद अब मेरा गावँ मेरा तीर्थ परिकल्पना के जरिये सँवर जाएं।
जमीन से दूर मॉडल-
धान का कटोरा कहा जाने वाला पलिया पिपरिया धान की उन्नत खेती के लिए जाना जाता हैं। जिस जैविक पद्धति का जिक्र जब संघ प्रमुख ने किया तो विचार में आदर्श नजर आने वाला जैविक संकल्प सवाल खड़े कर गया कि जहां बिजली,पानी के लिए आज भी गावँ में महज 6 घण्टे बमुश्किल हो जबकि कई गावँ तो पीने के साफ़ पानी को मोहताज हो तो कल्पना कीजिये फिलहाल हम कहाँ खड़े हैं। जैविक कृषि आदर्श हैं पर इसे बढ़ावा देने मुट्ठी भर जमीन के मालिक छोटे किसानों को प्रेरित किया जाएगा या सक्षम बड़े किसान जो स्वयं संसाधनों से परिपूर्ण है वही आदर्श बनेंगे। बहुतेरे सवाल है। आदिवासी अंचल ङोलनी जाकर इसे समझना पहली आवश्यकता हैं। बीते दिनों बाचावानी में दूषित पानी पीने से हुई मौत भी हमारे विकास की कलई खोलती रही हैं। मेरा गावँ मेरा तीर्थ बेशक क्षेत्र को मॉडल बना दे पर आशंका हैं यह ओल नदी पर हुए श्रमदान,अर्थदान,प्रदेश में ख्याति पाने के बाद सालभर में अपने बदहाल और निर्जीव होने परंपरागत उपेक्षा का शिकार की तरह गुमनाम न हो जाए। इंतजार करना होगा ग्राम के तीर्थ बनने तक।
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