बनखेड़ी( योगेश शर्मा)- गधा शब्द सुनते ही दो बातें दिमाग में आती हैं एक मूर्खता और दूसरी वफादारी। इन दिनों उत्तरप्रदेश के घमासान में जिस तरह "गधा"
सुर्खियों में आया हैं। इतिहास गवाह है इस प्रजाति को इतनी इज्जत नही बख्शी गई। दुर्भाग्यवश जिस तरह कोई खुद को गधा बताकर प्रजा के प्रति नतमस्तक हैं तो कोई गधे को मूर्खता की प्रासंगिक व्याख्या कर रहा हैं। दोनों ही स्थितियों में हर कोई सियासी लाभ लेने भाषा के सबसे निचले स्तर से सत्ता के नजदीक पाने आमदा हैं। जनता पारम्परिक लोकतंत्र के पर्व में स्वयं को मिलती क्षणिक तव्वजो से खुश हैं। खुश होना भी चाहिए इससे ज्यादा उसके वश में कुछ भी नही हैं। जो लोग कभी सत्ता के शीर्ष से आम आदमी के दर्द को महसूस नही कर सकें वे क्षण भर में कायनात बदलने की बाते मंच से चुटकियां लेते हुए कर रहें हैं।
सवाल इतना भर नही हैं कि किस गधे को चुना जाएं। सवाल तो यह हैं कि क्या गधा राष्ट्र रुपी मालिक के प्रति वफादार हैं ? गधे के स्वाभाव में कपट,छल,वादाखिलाफी नही होती। यह भले ही बेसुरा हैं लोगों के लिए मूर्खता का पर्याय हैं पर इतना जरूर समझिए गधे को सही दिशा में बढ़ने और गड्ढे से निकलने की समझ ईश्वरीय देंन हैं। तो फिर क्या मायने निकाले जाएं और किस गधे पर जनमानस भरोषा जताये। सियासी मायने में गधा इसके मूल स्वभाव,गुणों ,सादगी में बिलकुल अलग हैं। सियासी गधा तो बेहद चतुर,चालाक,सुरीला,मधुर,छलिया,आत्मप्रसंसी हैं।
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