शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

बनखेड़ीbkh को रात्रीकालीन ट्रेन न देने पर शुभकामनाएं।

बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- एक वर्ष के हर संभव संघर्ष के बाद बनखेड़ी हार गई और रेल प्रशासन की अनदेखी और हमारे जनप्रतिनिधियों की खामोशी आखिरकार जीत गई। युवा संघर्ष आखिरखार उन हालातों में राजनीति की कुटिल चालों से कैसे पार पाता। हमने आंदोलन का रास्ता न चुनकर विनम्रता को अपनाया पर शायद हम गलत थे। चुनावी मुहूर्त के समय ही आम आदमी की वेदना को सुनकर उसपर श्रेय का पॉलिस चढ़ाकर मुद्दा बनाये जाने की परंपरा आज भी बरकरार हैं। हमारे क्षेत्र में राजनीतिक मानसिकता का खूंटा इस कदर हावी हैं कि बनखेड़ी का अवरुद्ध विकास बहुत पीछे छूट गया।  मौसमी राष्ट्रधर्म के बादलों में युवा इस कदर उलझे की उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य की बेशाखियां जकड़ने लगी।

अब आलम यह हैं कि राजनीतिक नजरिया रखने वाले क्षेत्र के कर्णधार बेहद खुश हैं क्योंकि ट्रेन स्टापेज के मुद्दे पर उन्होंने बड़े ही अनुशासन से खामोश होकर इस मुद्दे को अपनी मुट्ठी में कर लिया। जब हमारे अपने ही जनप्रतिनिधि ट्रेन स्टॉपेज के मुद्दे पर असहज हो तो यकीन करना आसान हैं जबलपुर रेल मंडल की नजरों में तो बनखेड़ी नगर परिषद मुख्यालय जिससे 1.50 लाख आबादी जुड़ी हैं वो आज भी गुमनाम रेलवे स्टेशन हैं। मुझ जैसे बहुत से युवा आज सवाल उठाते हैं " ट्रेन स्टापेज का क्या हुआ" इस युवा जोश को कौन समझाए की ट्रेन स्टापेज के लिए उग्र आंदोलन ही ऐसा जरिया है जब बेसुध रेल प्रशासन सुध लेता हैं। पर यह भी समझना होगा की जिस क्षेत्र के प्रतिनिधि चुप,जिम्मेदार चुप ऐसे में आंदोलन जेंसे असंवैधानिक रुख से उन युवाओं का केरियर भी दागदार किया जा सकता है जिससे उनका भविष्य रेल विभाग के कानून तले दफन भी किया जा सकता हैं। यह राजनीति हैं,यहां विकास की चिंता किसे हैं?

गुस्सा भी आता हैं,सिस्टम की चुभन भी होती हैं पर संघर्ष और लड़ाई तब लड़ी जा सकती है जब यह गुस्सा सार्वजनिक हों। बनखेड़ी जेंसे क्षेत्र भी उदाहरण है विनम्रता का जिस पर खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं। प्रतिनिधित्व का आभाव इतना की भेड़ चाल चलने भी तैयार है। हालातों से समझौता करना बनखेड़ी  के संस्कार हैं। हम सच्चे भारतीय हैं,जागरूक हैं समाज के प्रति,नर्मदा के पूत हैं नदियों,तालाबों,प्रकृति,धर्म,सहिष्णुता,साहस,बलिदान,जज्बा सब कुछ हैं इसलिए धैर्य का जन्म होना लाजमी हैं। अगर बनखेड़ी की जुबान होती तो जरूर कह देती मेरा इतना अपमान मत करों की मेरी तासीर भी शर्मिदा हो जाए। नर्मदा जयंती एवं बसन्तोत्सव की हार्दिक स्नेहिल शुभकामनाएं।

"पीड़ित सभी हैं कुछ कहने का साहस नही जुटा पाते कुछ बेबाकी से हकीकत को आइना दिखा जाते हैं।"

अब तक रात्रीकालीन ट्रेन न मिलने पर आप सभी को बधाई,,,,

फरवरी भी आई बसंत फिजाओं में समाई,
ट्रेन रुकने की खबर पर आज तक न आई।।

बधाई हैं बधाई हैं,सियासत के योद्धाओं बधाई,
हम हार गए प्रयाशों में, आपकी खामोशी रंग लाई ।।

क्षेत्र फिर हार गया,राजनीति की बहार आई हैं,
ये  नपुंसक सम्मान हैं,आपको फिर बधाई हैं।।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी,,,

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