*हे माँ नर्मदा*
आस्था बहुत है,अब संरक्षण सा- आगाज़ हैं,
जीवनदायनी नर्मदा अब साँसों की मोहताज है।।
सिमटने लगा है नर्मदा का इस कदर आँचल,
पुण्य- सलिला माँ देख रही है खामोश हलचल।।
सतपुड़ा के घने जंगलों से आती ये सहायक नदियां,
बेजान बुत बन गईं बदहाल,निःशक्त,लाचार नदियां।।
रेत के सौदागर ख़ंजर चला रहें हैं माँ के सीने पर,
हम भीड़ हैं,भक्त हैं,प्यासे हैं,निर्भर हैं तेरे जीने पर।।
हे माँ सुना हैं तेरे दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है,
तेरे चीरहरण करने वालों को क्या सजा मिलती है।।
क्या इंसानियत मृत हैं या हैवानियत का कहर है,
माँ तेरी ममता है,रौद्र रूप में न आने का असर हैं।।
नमामि देवी नर्मदे अब तेरा वजूद तेरे हाथ में हैं,
दिखा अपनी शक्ति दुश्मनों का संहार तेरे हाथ में है।।
हम नही सुधरेंगे, काटेंगे उसी डाली को जिस पर सवार हैं,
तेरे निर्मल जल पर आस्था है तेरी बदहाली के हम जिम्मेवार हैं।।
रचना -
श्री योगेश शर्मा
बनखेड़ी
📞 9179064361
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