गुरुवार, 29 जून 2017

प्रधानमंत्रीजी के नाम पाती " आखिर हमें क्यों नही सुना जा रहा ?"

माननीय प्रधानमंत्रीजी
भारत सरकार,नई दिल्ली

विषय - विनम्रतापूर्वक तथ्यात्मक ट्रेन स्टॉपेज की मांग को लगातार अनदेखी करने वावत।

            माननीय प्रधानमंत्रीजी मैं जानना चाहता हूँ की सरकार द्वारा उन मांगों को तरहीज क्यों नही दी जाती जिनमें उग्र प्रदर्शन,शासकीय संपत्ति को नुकसान न पहुंचाया जाता हो बल्कि विनम्रता से जायज शांतिपूर्णमांग क्षेत्र के लोगों द्वारा  लाभान्वित होने सरकार की उद्देश्य पूर्ती में सहयोगी हो। माननीय विषय के अनुसार  मध्य रेल के जबलपुर मंडल से चलाई जाने वाली स्वास्थ्य सेवा हेतु नागपुर से जोड़ने वाली 12160अमरावती ट्रेन इसी क्षेत्र के लोगों को लाभान्वित करने चलाई जाती हैं। BKH बनखेड़ी का नगर परिषद एवं तहसील मुख्यालय लगभग 150 गावँ से सीधा जुड़ा है जहां रात्रि में 8 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ट्रेन का स्टॉपेज नही हैं। जिसकी शांतिपूर्ण मांग बनखेड़ी संघर्ष समिति द्वारा विगत दो वर्षों से किया जा रहा हैं। जो इस बड़े कृषि बाहुल्य क्षेत्र की आत्मनिर्भरता में विगत कई वर्षों से बाधक बना हुआ हैं। आपको अवगत कराना चाहूंगा कि इस ज्वलंत मांग की निराधार अनदेखी रेल मंडल द्वारा जारी हैं। पत्र के माध्यम से दो बिंदुओं पर अपनी वेदना प्रकट करने की मंशा आपके न्यायोचित हस्तक्षेप हेतु प्रस्तुत हैं-

(1)   क्या सहयोगी राष्ट्र हित  विचारधारा की आवाम को      उनकी जायज मांगो और सुविधाओं को नजर अंदाज कर उग्रता हेतु विवश किया जाता हैं तब जाकर सरकार का ध्यानाकर्षित होता हैं ?

(2) आम जनता का ग्रामों से पलायन न हो इसलिए सरकार ग्रामीण अंचलों को आत्मनिर्भर बनाने वचनबद्ध हैं,फिर उसी जनता को सुविधा देने किसी भी एक रात्रीकालीन ट्रेन का महज 1 मिनिट का स्टॉपेज देना क्यों संभव नही हैं जबकि रेलवे के आंकड़े बताते है कि जबलपुर मंडल से चलने वाली ट्रेनों में 1 से 2 मिनिट की गुंजाइश रेल रेवेन्यू को प्रभावित नही करती । जबकि बनखेड़ी BKH रेलवे स्टेशन का रेल रेवेन्यू अल्प सुविधाओं के वावजूद समीपस्थ इस श्रेणी की स्टेशनों से बेहतर हैं।

               उक्त माध्यम से आपको अवगत कराना चाहूंगा कि बनखेड़ी bkh रेलवे स्टेशन से डेढ़ लाख की आबादी जुडी हैं। यहाँ सुबह एवं शाम को दो एक्सप्रेस ट्रेनों की सुविधा भी      उचित मांग के आधार पर विगत 10 से 20 वर्ष पहले प्रदान की गई थी। समय के साथ बढ़ती आबादी एवं आवश्यकता के लिहाज से रात्रीकालीन ट्रेन की दरकार बेहद अहम हैं। उचित हस्तक्षेप की आशा से आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।

                                                             प्रार्थी
                                                
                                                 योगेश शर्मा,
                                                        बनखेड़ी
                                                   जि - होशंगाबाद                       (म प्र)       

सांसदजी अब आप ही अगुवाई करें ट्रेन स्टॉपेज के लिए।

प्रति,
      सांसद महोदय
    होशंगाबाद- नरसिंहपुर
      संसदीय क्षेत्र

विषय - ट्रेन स्टॉपेज की मांग का प्रतिनिधित्व करने वावत।

          महोदयजी बनखेड़ी bkh में रात्रीकालीन ट्रेन स्टॉपेज की मांग निरंतर की जा रही हैं पर रेल प्रशासन द्वारा इस मांग को तरहीज नही मिली न ही कारण ज्ञात हो सका की हमें रात्रीकालीन ट्रेन क्यों नही दी जा सकती। महोदय जी आप इस क्षेत्र के सक्षम जनप्रतिनिधि हैं जनवेदना से वाकिफ भी हैं कि बगैर कोई उग्र प्रदर्शन शांतिपूर्ण मांग बीते 2 वर्षों से की जा रही हैं। अगर रेल प्रशासन ध्यान नही देता है तब आपकी जवावदेही बनती हैं कि आप ही बनखेड़ी क्षेत्र की मांग का प्रतिनिधित्व करें। इस आशय से हमारी मांग की अगुवाई आम जनता के साथ प्रथम पंक्ति में खड़े होकर आप करेंगे। ऐसी आशा और अनुरोध हैं।

हम क्षेत्र के आशावादी लोगों का धैर्य अब जवाव दे रहा हैं चूँकि उग्रता दिखाना हमारे क्षेत्र का आचरण नही हैं बल्कि राष्ट्र निर्माण में सदैव सहयोग करने वाले क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने वाली रात्रीकालीन ट्रेन के अतिआवश्यक स्टापेज से वंचित किया जा रहा हैं।  चूँकि हमें इस बात का भी अफ़सोस हैं कि उग्रता,अभद्रता,शासकीय संपत्ति को नुकसान करने वाले  लोगों की आवाज ही सरकार और जनप्रतिनिधि सुनपाते हैं। अतः आपसे विनम्र निवेदन हैं कि हमारे बीच जमीनी नेतृत्व कर हमारी मांग को आप निर्णायक बनाने अनुमति प्रदान करें। उचित विनय प्रस्तुत हैं।

                                                          प्रार्थी

                                          योगेश शर्मा,बनखेड़ी

शनिवार, 11 मार्च 2017

जीत दर जीत जवावदेही तो बढ़ेगी ही,,,,,,

बनखेड़ी ( योगेश शर्मा) - देश के सबसे बड़े राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोषे की ऐसी मुहर लगाई की यह जीत लोकसभा 2014 की तरह ऐतिहासिक बन गई। उत्तराखंड भी एकतरफा फतह किया। हालांकि मतदाताओं ने गोवा,मणिपुर,पंजाब में जता दिया की उनकी मंशा मंच से विकास को जमीन पर देखने की हैं। यही उत्तरप्रदेश में हुआ पीएम को और भी ज्यादा जिम्मेदारी का अहसास करा दिया। अब सब कुछ आपके हवाले हैं करिये अपनी नीतियों से देश और प्रदेश का बदलाव। नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक यकीनन  साहसिक कदम था। क्या खोया,क्या पाया अलग बात है। इसके दूरगामी परिणाम अभी आने बाकी हैं। राममंदिर बने या न बने पर किसानों की हालत सुधरें,भृष्टाचार पर लगाम लगे,युवाओं को रोजगार मिलें।

समय बदल रहा हैं सोच भी बदल रही हैं लोग एनचुनाव के वक्त मंचों से फेंके गए रहमत बरसाने वाले लुभावने वादों पर  यकीन नही करते वर्ना पंजाब में तस्वीर अलग होती। पांच रॉज्यो में एंटी इंकमबेंसी फैक्टर देखने को मिला हैं। लोकतंत्र में अवसरवाद सदैव हावी रहा हैं। जाने कब अच्छे दिन आएंगे यह इन्तजार आज भी है। पंजाब में नशे कारोबार खत्म होगा भले ही वहाँ अब आपकी सरकार नही हैं देखना दिलचस्प होगा उप्र में किये गए आपके वादों के हिसाब से भेदभाव पंजाब से भी नही होगा। क्योंकि अगर पंजाब ने पहले आपको चुना है कैप्टन को बाद में। उत्तराखंड में रावत सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश था सो वहाँ सत्ता आपको सौप दी।

गधे से प्रेरणा भी ले ली गई,धर्म को भी ढाल बनाकर सियासत गढ़ी गई और सफल भी हुई पर जिस अंदाज में आप सबसे लोकप्रिय जननेता बनकर उभरे हैं तो यकीनन उम्मीदों का पिटारा भी आपके कंधों पर हैं भारत की उम्मीदें भी ? अंत में कांग्रेस,सपा,बसपा को सबक लेना होगा की राजनीति परंपरागत तौर तरीकों से इतर समय रहते संभलने की हैं। एक दुर्भाग्य भी हैं कि लोकतंत्र में विपक्ष कमजोर होता जा रहा हैं। ईश्वर न करे जननायक मोदी जी इस सच को समझते रहें और सफलता के घोड़े पर सवार होकर पार्टी को बेलगाम न छोड़ दे। क्योंकि व्यापम घोटाला,बेलगाम आतंकी घटनाएं,कालाधन,काश्मीर में धारा 370,अस्थिरता,आईएसआई एजेंटों के खुलाशे,किसानों की आत्महत्या,जेंसे मुद्दों पर देश के प्रधानमंत्री की बेबाक जुबान खुलना अभी बाकी हैं। होली की हार्दिक स्नेहिल शुभकामनाएं,,,,,,,,,

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

गधे पर सवार सियासत ,,,,,,,,

बनखेड़ी( योगेश शर्मा)- गधा शब्द सुनते ही दो बातें दिमाग में आती हैं एक मूर्खता और दूसरी वफादारी। इन दिनों उत्तरप्रदेश के घमासान में जिस तरह "गधा"
सुर्खियों में आया हैं। इतिहास गवाह है इस प्रजाति को इतनी इज्जत नही बख्शी गई। दुर्भाग्यवश जिस तरह कोई खुद को गधा बताकर प्रजा के प्रति नतमस्तक हैं तो कोई गधे को मूर्खता की प्रासंगिक व्याख्या कर रहा हैं। दोनों ही स्थितियों में हर कोई सियासी लाभ लेने भाषा के सबसे निचले स्तर से सत्ता के नजदीक पाने आमदा हैं। जनता पारम्परिक लोकतंत्र के पर्व में स्वयं को मिलती क्षणिक तव्वजो से खुश हैं। खुश होना भी चाहिए इससे ज्यादा उसके वश में कुछ भी नही हैं। जो लोग कभी सत्ता के शीर्ष से आम आदमी के दर्द को महसूस नही कर सकें वे क्षण भर में कायनात बदलने की बाते मंच से चुटकियां लेते हुए कर रहें हैं।

सवाल इतना भर नही हैं कि किस गधे को चुना जाएं। सवाल तो यह हैं कि क्या गधा राष्ट्र रुपी मालिक के प्रति वफादार हैं ? गधे के स्वाभाव में कपट,छल,वादाखिलाफी नही होती। यह भले ही बेसुरा हैं लोगों के लिए मूर्खता का पर्याय हैं पर इतना जरूर समझिए गधे को सही दिशा में बढ़ने और गड्ढे से निकलने की समझ ईश्वरीय देंन हैं। तो फिर क्या मायने निकाले जाएं और किस गधे पर जनमानस भरोषा जताये। सियासी मायने में गधा इसके मूल स्वभाव,गुणों ,सादगी में बिलकुल अलग हैं। सियासी  गधा तो बेहद चतुर,चालाक,सुरीला,मधुर,छलिया,आत्मप्रसंसी हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

मेरा गावँ मेरा तीर्थ,,,,,संकल्पना स्वागत योग्य हैं पर,,,

संघ प्रमुख की चेतावनी न हो नेतागिरी,कल्पना बनकर न रह जाएं संकल्पना
जिसने आधुनिकता से जोड़ने थामा हाथ उसी के हो लिए आदिवासी

बनखेड़ी ( योगेश शर्मा)- मेरा गावँ मेरा तीर्थ संकल्पना बेहद अच्छी कल्पना हैं पर भागवत जी के आगमन उपरांत यह जमीन पर गति पकड़ेगी। क्योंकि जिस अंदाज में सर संघ चालक मोहन भागवत ने चेताया कि नेतागिरी की तरह न हो ग्राम उत्थान,बहुत कुछ असलियत जताता हैं। जल,जंगल,जमीन,जानवर की हालत इन दिनों क्या हैं इस का इशारा भी उन्होंने किया। केंद्र और राज्य में सत्ता सीन समकालीन सरकार के होते हुए भी नदी में रेत का अवैध उत्खनन,जंगलों की अवैध कटाई,जमीन के लिहाज से फसल बीमा की हकीकत, गौ वंश के अवैध धंधे इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहें हैं। जिस नेतागिरी का जिक्र कर उन्होंने चेताया वह भी चिंतनीय विषय हैं। रोडो के गड्ढे बीते दो वर्षों में आम आदमी के लिए नही भरे गये पर संघप्रमुख के आगमन पूर्व रातों रात रोड के गड्ढे भरना दिखावे की इस नेतागिरी और विकास के मॉडल की कलई खोलने काफी।

धर्मांतरण क्यों ?

जिस गावँ को तीर्थ का दर्जा देने यह संकल्पना की गई हैं सन्देह नही की आम जनमानस इसे नही अपनाएगा। पर यदि यह अभियान भागवतजी के आगमन के बाद फीका पड़ा तो आम जनमानस चाहकर भी इस अभियान से नही जुड़ सकेगा। सक्षम,न्यास का गृह नगर बनखेड़ी विकास से कोसों दूर खड़ा हैं यह साफतौर पर नजर आता हैं। ट्रेन स्टापेज,झिरपा मार्ग अगर समय रहते दिया जाता तो आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने की कवायद धर्मांतरण पर लगाम लगाने कारगर हो जाती। स्वास्थ्य,शिक्षा,रोजगार के आभाव में आदिवासी खुद भूल चुके है कि उनका अपना हैं कौन शायद वजह भी यही हैं चुनावी समर में याद आने वाला आदिवासी उसी के हो लिये जिसने इसे लालच देकर आधुनिकता से जोड़ा। क्षेत्र के तालाब जनसहयोग और श्रमदान के बाद प्रशासन की नींद नही तोड़ सकें शायद अब मेरा गावँ मेरा तीर्थ परिकल्पना के जरिये सँवर जाएं।
जमीन से दूर मॉडल-
धान का कटोरा कहा जाने वाला पलिया पिपरिया धान की उन्नत खेती के लिए जाना जाता हैं। जिस जैविक पद्धति का जिक्र जब संघ प्रमुख ने किया तो विचार में आदर्श नजर आने वाला जैविक संकल्प सवाल खड़े कर गया कि जहां बिजली,पानी के लिए आज भी गावँ में महज 6 घण्टे बमुश्किल हो जबकि कई गावँ तो पीने के साफ़ पानी को मोहताज हो तो कल्पना कीजिये फिलहाल हम कहाँ खड़े हैं। जैविक कृषि आदर्श हैं पर इसे बढ़ावा देने मुट्ठी भर जमीन के मालिक छोटे किसानों को प्रेरित किया जाएगा या सक्षम बड़े किसान जो स्वयं संसाधनों से परिपूर्ण है वही आदर्श बनेंगे। बहुतेरे सवाल है। आदिवासी अंचल ङोलनी जाकर इसे समझना पहली आवश्यकता हैं। बीते दिनों बाचावानी में दूषित पानी पीने से हुई मौत भी हमारे विकास की कलई खोलती रही हैं। मेरा गावँ मेरा तीर्थ बेशक क्षेत्र को मॉडल बना दे पर आशंका हैं यह ओल नदी पर हुए श्रमदान,अर्थदान,प्रदेश में ख्याति पाने के बाद सालभर में अपने बदहाल और निर्जीव होने परंपरागत उपेक्षा का शिकार की तरह गुमनाम न हो जाए। इंतजार करना होगा ग्राम के तीर्थ बनने तक।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

बनखेड़ीbkh को रात्रीकालीन ट्रेन न देने पर शुभकामनाएं।

बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- एक वर्ष के हर संभव संघर्ष के बाद बनखेड़ी हार गई और रेल प्रशासन की अनदेखी और हमारे जनप्रतिनिधियों की खामोशी आखिरकार जीत गई। युवा संघर्ष आखिरखार उन हालातों में राजनीति की कुटिल चालों से कैसे पार पाता। हमने आंदोलन का रास्ता न चुनकर विनम्रता को अपनाया पर शायद हम गलत थे। चुनावी मुहूर्त के समय ही आम आदमी की वेदना को सुनकर उसपर श्रेय का पॉलिस चढ़ाकर मुद्दा बनाये जाने की परंपरा आज भी बरकरार हैं। हमारे क्षेत्र में राजनीतिक मानसिकता का खूंटा इस कदर हावी हैं कि बनखेड़ी का अवरुद्ध विकास बहुत पीछे छूट गया।  मौसमी राष्ट्रधर्म के बादलों में युवा इस कदर उलझे की उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य की बेशाखियां जकड़ने लगी।

अब आलम यह हैं कि राजनीतिक नजरिया रखने वाले क्षेत्र के कर्णधार बेहद खुश हैं क्योंकि ट्रेन स्टापेज के मुद्दे पर उन्होंने बड़े ही अनुशासन से खामोश होकर इस मुद्दे को अपनी मुट्ठी में कर लिया। जब हमारे अपने ही जनप्रतिनिधि ट्रेन स्टॉपेज के मुद्दे पर असहज हो तो यकीन करना आसान हैं जबलपुर रेल मंडल की नजरों में तो बनखेड़ी नगर परिषद मुख्यालय जिससे 1.50 लाख आबादी जुड़ी हैं वो आज भी गुमनाम रेलवे स्टेशन हैं। मुझ जैसे बहुत से युवा आज सवाल उठाते हैं " ट्रेन स्टापेज का क्या हुआ" इस युवा जोश को कौन समझाए की ट्रेन स्टापेज के लिए उग्र आंदोलन ही ऐसा जरिया है जब बेसुध रेल प्रशासन सुध लेता हैं। पर यह भी समझना होगा की जिस क्षेत्र के प्रतिनिधि चुप,जिम्मेदार चुप ऐसे में आंदोलन जेंसे असंवैधानिक रुख से उन युवाओं का केरियर भी दागदार किया जा सकता है जिससे उनका भविष्य रेल विभाग के कानून तले दफन भी किया जा सकता हैं। यह राजनीति हैं,यहां विकास की चिंता किसे हैं?

गुस्सा भी आता हैं,सिस्टम की चुभन भी होती हैं पर संघर्ष और लड़ाई तब लड़ी जा सकती है जब यह गुस्सा सार्वजनिक हों। बनखेड़ी जेंसे क्षेत्र भी उदाहरण है विनम्रता का जिस पर खूब राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं। प्रतिनिधित्व का आभाव इतना की भेड़ चाल चलने भी तैयार है। हालातों से समझौता करना बनखेड़ी  के संस्कार हैं। हम सच्चे भारतीय हैं,जागरूक हैं समाज के प्रति,नर्मदा के पूत हैं नदियों,तालाबों,प्रकृति,धर्म,सहिष्णुता,साहस,बलिदान,जज्बा सब कुछ हैं इसलिए धैर्य का जन्म होना लाजमी हैं। अगर बनखेड़ी की जुबान होती तो जरूर कह देती मेरा इतना अपमान मत करों की मेरी तासीर भी शर्मिदा हो जाए। नर्मदा जयंती एवं बसन्तोत्सव की हार्दिक स्नेहिल शुभकामनाएं।

"पीड़ित सभी हैं कुछ कहने का साहस नही जुटा पाते कुछ बेबाकी से हकीकत को आइना दिखा जाते हैं।"

अब तक रात्रीकालीन ट्रेन न मिलने पर आप सभी को बधाई,,,,

फरवरी भी आई बसंत फिजाओं में समाई,
ट्रेन रुकने की खबर पर आज तक न आई।।

बधाई हैं बधाई हैं,सियासत के योद्धाओं बधाई,
हम हार गए प्रयाशों में, आपकी खामोशी रंग लाई ।।

क्षेत्र फिर हार गया,राजनीति की बहार आई हैं,
ये  नपुंसक सम्मान हैं,आपको फिर बधाई हैं।।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी,,,

नर्मदा तेरे यशगान से जरूरी हैं तेरा वर्तमान लिंखु,,,

*हे माँ नर्मदा*

आस्था बहुत है,अब संरक्षण  सा- आगाज़ हैं,
जीवनदायनी नर्मदा  अब साँसों की मोहताज है।।

सिमटने लगा है नर्मदा का इस कदर आँचल,
पुण्य- सलिला माँ देख रही है खामोश हलचल।।

सतपुड़ा के घने जंगलों से आती ये सहायक नदियां,
बेजान बुत बन गईं बदहाल,निःशक्त,लाचार नदियां।।

रेत के सौदागर ख़ंजर चला रहें हैं माँ के सीने पर,
हम भीड़ हैं,भक्त हैं,प्यासे हैं,निर्भर हैं तेरे जीने पर।।

हे माँ सुना हैं तेरे दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है,
तेरे चीरहरण करने वालों को क्या सजा मिलती है।।

क्या इंसानियत मृत हैं या हैवानियत का कहर है,
माँ तेरी ममता है,रौद्र रूप में न आने का असर हैं।।

नमामि देवी नर्मदे अब तेरा वजूद तेरे हाथ में हैं,
दिखा अपनी शक्ति दुश्मनों का संहार तेरे हाथ में है।।

हम नही सुधरेंगे, काटेंगे उसी डाली को जिस पर सवार हैं,
तेरे निर्मल जल पर आस्था है तेरी बदहाली के हम जिम्मेवार हैं।।

रचना -
श्री योगेश शर्मा
बनखेड़ी
📞 9179064361

बुधवार, 25 जनवरी 2017

कब तक गिड़गिड़ाएं चंद लोग ट्रेन के लिए?

बनखेड़ी (योगेश शर्मा) - ट्रेन स्टॉपेज के लिए कब तक गिड़गिड़ायें भीड़ बढ़ाने और कमजोर प्रतिनिधियों की हौसला अफजाई का ठेका तो हमने ही ले रखा हैं। क्या होगा जो ट्रेन स्टॉपेज न दिया गया। क्या हुआ जिसके लिए सत्ता शासक आपकी सुध लें। जरूरत तो सिर्फ उन चंद लोगों में सिमट कर रह गई हैं जो ट्रेन स्टापेज का मुद्दा मरने नही दे रहें हैं। डर है या हकीकत जिसके चलते बड़े गर्व से भीड़ का हिस्सा बनने हर कोई तैयार खड़ा हैं। कमजोर कौन हैं बेबस लाचार भीड़ या चुनाव के वक्त रहम का टुकड़ा डालकर फोटो के सहारे जननायक बनने की चाह रखने वाले जनप्रतिनिधि ?

क्या सार्वजनिक मंच पर कहने का साहस उन जनप्रतिनिधियों का हैं जो यह कह दे प्रयास तो किये है पर रेल प्रशासन सुन नही रहा,,,,,,,,फिर कमजोर कौन हैं समझा जा सकता हैं। इतने बड़े ट्रेन स्टापेज के मुद्दे को दबाने की कोशिश कामयाब होती नजर आ रही हैं। क्योंकि चंद निजी स्वार्थों के कारण हमने भीड़ बढ़ाने की कमजोरी को सत्ताधारियों की कला में बदल दिया हैं। भावनाओं में  मौसमी देशभक्ति का चलन इस कदर बड़ा की घनघोर अंधियारे में भी क्षेत्र चमकता नजर आता हैं। भाषणों की कलाकारी ने इस कदर प्रभावित किया कि हम अपने क्षेत्र का सम्मान और हक भी भूलने लगें।

इसे दुर्भाग्य ही कहें आवाज उठाने वालों पर मानसिकता का पर्दा होने का आरोप लगाकर उन्हें ही कटघरे में खड़ा करने से भी नही चुके। रेवेन्यू हैं,क्षेत्र का बड़ा रकवा हैं,महती जरूरत है,आम जनमानस की बुनियादी जरूरत से जुड़ा मसला हैं। वावजूद इसके 2 मिनिट का ट्रेन स्टापेज मील का पत्थर साबित हो रहा हैं जिम्मेदार कौन ? क्या रेल विभाग अंग्रेजी हुकूमत का हिस्सा है जिसे लाखों लोगों की तकलीफ का अहसास नही या हकीकत में क्षेत्र के पास ऐसा कोई नेतृत्व ही नही जो रेल मंडल के समक्ष इस हकीकत का अहसास कराने की इक्षाशक्ति हो।  राजनीतिक भीड़ का हिस्सा बनना बताता हैं हमें अपनी शक्ति और क्षेत्र के सम्मान का अहसास नही हैं। इन मरी हुई संवेदनाओं में क्षेत्र के सम्मान की बात करना बेमानी हैं। जन आंदोलन तब बनते हैं जब अपने क्षेत्र और बस्ती की वेदना का अहसास हो,,,,,,,,,,,,चंद लोग आज नही तो कल आवाज उठाते उठाते तक जाएंगे और  हम भीड़ बनकर बर्बाद आंगन से मंजर को देखकर भी आँख मूँद लेंगे और तालिया बजाकर साबित कर देंगे हम आपके नेतृत्व से बहुत खुश हैं। आज के दौर की गणतंत्रता यही हैं।

गणतंत्र दिवस शुभ हो,,,,,,,,,,,शुभ हो,,,,,,