Sc/st एक्ट का जिन्न क्या गुल खिलायेगा जब दलित शब्द का राजनीतिकरण चरम को छू रहा है। जिन्न जो बोतल में बंद था जातिवाद की राजनीति से समाज ऊब रहा था इस जिन्न के बाहर निकलते ही फिर जातिवाद की अघोषित जंग छिड़ गई। हकीकत इससे अलग है जिस वर्ग ने शिक्षा को महत्व दिया और अवसरों के लिए आगे बढ़ने संघर्ष किया वह आगे निकल गए। रहन सहन और जीवन शैली में बदलाव आया। जबकि जिस वर्ग ने मिले अवसर और कानूनी संबल का गलत इरादों के लिए उपयोग किया उसका दोहन औरों ने हथियार के तौर पर किया। हकीकत में sc/st एक्ट के वर्तमान स्वरूप का विरोध इस हथियार के कारण पैदा हुआ डर है। जिस दबे,कुचले,उपेक्षित वर्ग से शिक्षित लोग निकले उन्होंने उस समाज को नई उम्मीद,सम्मान और साहस देने अग्रजों की भूमिका निभाई।
"दलित" शब्द का आशय समझे बिना एक सूत्र में इसे परिभाषित करना राजनीति के लिए सरल जरूर हो जाता है क्योंकि इसी शब्द के आसरे राजनीति शिखर तक पहुंची है यह प्रतीत होता है। इतिहास में शोषित वर्ग का शोषण हुआ क्योंकि इस तबके से शिक्षा कोसों दूर खड़ी थी इसलिए आज भी उन अहसासों के जख्म विद्रोह के रूप में देखने मिलते है। बाहुबलियों ने इस अशिक्षित तबके का खूब दोहन किया पर यह कहना गलत होगा कि उच्च समाज के कमजोर लोग इस व्यथा से अछूते थे। एक विचार यह भी है कि उच्च शिक्षित वर्ग जो इसी तबके से आता है वह दलित कैसे क्योंकि उसके अपने संघर्ष ने दलित कुंठा पर विजयश्री हासिल कर अपना स्थान बनाया । क्या कारण है कि जो दलित वर्ग के शीर्ष नेतृत्व बनकर उभरे वह स्वयं को दलित कहलवाकर क्यों उस योग्यता का अपमान करने आमदा है जिनका अनुकरण मात्र ही इस तबके का भविष्य बनाने सक्षम है। सरकारें वोट बैंक पर नजर गड़ाएं सुप्रीम कोर्ट के फैंसले पलटने जो आतुरता दिखाती है और बगैर किसी विरोध के अन्य राजनीतिक दल जिस राजनीतिक भाईचारे का दर्शन कराते है यह भी भारत में बदलाव की आहट तो है। यह अलग बात है कि नए मुद्दे ने विकास,महंगाई से इतर एक नई बहस छेड़ दी है जिसके दूरगामी परिणाम भयावह होंगें इस आशंका को खारिज नही किया जा सकता।
शिक्षा का स्तर सुधरा तो हालात बदले,,,,,, नही बदला वह तबका जो आज भी शिक्षा के महत्व को नही समझा और इस वर्ग में सिर्फ उन विरादियों को रखा जाना भी गलत है जिसके इर्द गिर्द दलित शब्द फल फूल रहा है। सवर्ण भी शिक्षित नही है वहां आज भी जातिवाद प्रतिष्ठा निर्धारण करता है। ठीक वैसे ही जेंसे कर्मकांडी न होते हुए ब्राह्मणत्व का पालन न करते हुए लोग स्वयंभू पंडित कहलाने लग गए। कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था उस दौर में भी थी और आज भी जीवित है कर्म प्रधान समाज शरीर के महत्वपूर्ण अंग माने गए जिसमें एक वर्ग रूपी अंग भी आहत हुआ तो पूरा शरीर शिथिल हो गया मतलब किसी एक तबके की भूमिका भी सामाजिक ढांचे में महत्वपूर्ण है वर्ण व्यवस्था उस दौर में थी और आज भी है पर शिक्षा ने असमानता पर प्रहार किया परिणाम आये शिक्षा के महत्व से कुछ हद तक अंधेरे छटे पर कुटिल राजनीतिक चालों ने इस असमानता को कायम रखने फिर दांव फेंके योग्यता हारती रह गई और समाजवाद जीतता चला गया इसका उल्टा कर दीजिए तो आज का सामाजिक परिवेश पटल पर स्वतः ही परिलक्षित हो जाएगा। गरीब गरीब रह गया अमीर और अमीर होते चले गए पर इन दो पाटों से जो जूझ गया वह महान हो गया और महानता की न कोई जाति होती और न ही धर्म ठीक वैंसे ही जेंसे निम्न जाति का उच्चशिक्षित डॉक्टर उच्च वर्ग के मरणासन्न अवस्था में उस व्यक्ति अथवा परिवार के लिए भगवान होता है। शायद इस योग्यता और काबिलियत का अहसास भी दलित और सवर्ण के भंवर में उलझ कर रह गया। कल्पना कीजिये जिस वक्त एससीएसटी कानून बना या आरक्षण निर्धारित हुआ क्या इसे अमल में लाने उच्च शिक्षित वर्ग का चिंतन नही रहा होगा ? क्या सकारात्मक सोच नही होगी कि निम्न दबा,असहाय,पीड़ित,शोषित,अति गरीब वर्ग को कैसे समाज में अवसर मिले यह इसलिए क्योंकि उस दौर में उच्च पदों पर अमूनन सवर्णों का एकाधिकार अधिपत्य था। ऐसे बहुत से उदाहरण है जब शोषित समाज का व्यक्ति संघर्ष करते हुए लोकतंत्र का हिस्सा बना तो आगे बढ़ता चला गया जबकि अशिक्षित व्यक्ति अवसरवाद के चलते सिर्फ कठपुतली बनकर रह गया विचार कीजिये शिक्षा से सम्मान है या सम्मान की लालसा की हठधर्मिता की वजह से शिक्षा आज भी अधूरी है और जब जब अधूरापन अस्तित्व में आएगा देश गृहयुद्ध की ओर रुख करेगा। भारत माता की जयघोष में बुलंदी का अहसास होता है तो उसके बेटे होने का अहसास जगाइए और बड़ी और सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज इस घृणा,उपेक्षा,कुंठा का कारक "दलित",,,,,,,अहंकार,अभिमान से सने "सवर्ण" का चोला त्याग करते हुए शिक्षित समाज और शिक्षा की रौशनी से इन अँधियारो को हरने का साहस कीजिये।
सादर वंदे मातरम,,,,,,,योगेश शर्मा,बनखेड़ी

