संयम,संकल्प,आत्मस्वाभिमान,कर्तव्य का भाव गुरु - शिष्य दोनों में बेहद आवश्यक
( योगेश शर्मा ) - गुरुपूर्णिमा पर अपने अपने गुरुओं को श्रीफल भेंटकर उनका अभिनन्दन किया गया एवं मंदिरों में धार्मिक आयोजन किये गए। हर व्यक्ति के जीवन में गुरु का स्थान बेहद अहम होता है। विद्वान आचार्यों ने गुरु पूर्णिमा पर कुछ इस तरह संदेश दिया। गुरु का वास्तविक आशय जहां मार्गदर्शक से है वही भविष्य निर्माता के तौर पर गुरु,शिक्षक एवं माता - पिता इस परिभाषा में सबसे ऊपर स्थान रखते है। पश्चिमी सभ्यता के दखल एवं चकाचौन्ध के बीच गुरु पूर्णिमा के महत्व अथवा सनातन धर्म की अमिट परंपरा का जिक्र बेहद जरूरी हैं। यह बेहद आवश्यक हैं कि इसे केवल और केवल धर्म एवं ओपचारिकता से इतर भी समझा जाये। यह इस लिए क्योंकि धर्म के व्यवसायिक रूप ने जहां आस्था को प्रभावित किया हैं। उदाहरण के तौर पर बीते दिनों जिस तरह धर्म की आड़ में कथित व्यापार,चरित्र का चेहरा भी सामने आया है। जबकि समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति सजग करने,मानवीयता,कर्तव्य एवं सामाजिक दायित्व की ओर प्रेरित करने तथा ईश्वर से जोड़ने वाले किरदार अथवा संत समाज के प्रति अटूट भरोषा भारतीय संस्कारों का हिस्सा हैं और रहेंगें शायद गुरु पूर्णिमा का अवसर यह आभास जरूर दिलाता हैं। दोनों ही सूरतों में गुरु एवं शिष्य की अपनी अपनी जिम्मेदारी बनती हैं। नए दौर की युवा पीढ़ी इस आदर्श उत्सव के महत्व को समझ सकें यही किसी गुरु के लिए सबसे बड़ी गुरु दक्षिणा है।
संस्कारवान बनना ही गुरु दक्षिणा -
वर्तमान समय में बेहतर व्यक्तित्व बनकर भी आपके गुरु,मार्गदर्शक,समाज,गावँ,परिवार का गौरव बढ़ा सकते है । योग्यता को तराशने की जरूरत होती है सिर्फ और सिर्फ गुरुमंत्र से कान फुकवाना काफी नही जब तक इस मंत्र का सार्थक अनुकरण न किया जावें। सनातन धर्म मानवीय जीवन का पूर्वावलोकन है हर ग्रँथ अथवा शास्त्र प्रेरित करता हैं भीड़ में अलग पहचान बनाने की जैसे सफल व्यक्ति का गुरु सदैव गौरान्वित होता हैं क्योंकि शिष्य की कामयाबी ही गुरु की सफलता और गुरु दक्षिणा है। हिंदू धर्म की खूबसूरती उदारता,समर्पण,प्रेम एवं रिश्तों की अहमियत, संवेदना,करुणा में बसती है गुरु पूर्णिमा पर संकल्प लें कि राह वह हो जिससे माता पिता का सम्मान हो जीवन में गुरु अति आवश्यक है भले ही वे माता पिता,शिक्षक,मित्र की भूमिका में हों। मन के विचारों में आत्मस्वाभिमान,साहस,संयम,दया,निष्ठा हो तब मंदिरों में ईश्वर का सामना करें। प्रकृति,पशु,भूमि एवं कर्मभूमि के प्रति दायित्वान बनना हमारा धर्म जताता है यही गुरु पूर्णिमा पर गुरु की प्रेरणा होनी चाहिए।
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