योगेश शर्मा - देश शोक में डूबा हुआ है क्योंकि राजनीतिक आदर्श का वो सूरज अस्त हो चुका है अब कृत्रिम रोशनी से अंधेरा भले छट जाए पर अंधेरें का तिलिस्म कौन सा चिराग तोड़ेगा यह प्रश्न तो जरूर उठेगा और चिंतन भी करना ही होगा। अपने राजनीतिक जीवन में देश और लोकतंत्र को पार्टी से ऊपर रखने वाले अटल बिहारी बाजपेयी वर्तमान राजनीति परिदृश्य को आइना तो दिखा गए। यह बात हर जहन में है अटल क्यों सर्वमान्य नेता कहलाएं ? संसद की मर्यादा को जीवित रखने अटल सत्य तब भी गौरवशाली रहा और अब जबकि दिवंगत आत्मा की अमिट आवाज गूंजते शब्दों से अब भी सदन स्वयं को गौरवशाली महसूस करेगा।विपक्ष को वह आदर सम्मान जो अटल युग में परंपरा बना क्योंकि तब की भाजपा और आज की भाजपा के बीच बड़ी लकीर है जो भेद करने विवश करती है। अटल बेबाकी से स्वीकार करते थे कि आजादी के बाद भारत तेजी से आगे न सिर्फ बढ़ा बल्कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र को सदैव गौरवांवित होने अवसर पैदा करने जन्मदाता भी बना। अटल ने विपक्ष में रहते हुए सदैव कमियों को लेकर प्रहार भी किया और लोकतंत्र के प्रहरी भी बने पर स्वर्णिम इतिहास के वे पन्ने जिनसे भारत का निर्माण हुआ उनकी व्याख्या करना कभी न भूलें।
सरकार आई गईं,राजनीतिक परिदृश्य कई बार बदला भी,गिरकर बार बार संभलें भी। लाल किले की प्राचीर से अटल ललकारे भी और देश की आवाम को बातों बातों में नसीहत भी दी,समकालिक सरकारों की कमियां भी गिनाई और पीठ थपथपाकर अहसास भी कराया देश से बढ़कर कोई नही। संकटकाल में साथ भी खड़े हुए और भारत की गरिमा को हिमालयी ऊंचाई भी दी। यह वह दौर था जब भाजपा ने हिंदू और हिंदुत्व का मतलब भी बताया और सर्वधर्म समभाव की पैरवी भी की। हिंदू होने पर फक्र भी जताया और अन्य धर्मों के प्रति नफरत के ढोंग से भी परहेज किया।
वर्तमान भाजपा आधुनिक होकर खड़ी हुई जहां भगवा का जिक्र भी है और आरक्षण और जातिवाद के जिन्न के प्रभाव में चोटिल होता हिंदुत्व भी है मुस्लिम और इस्लाम से समानांतर दूरी भी है और तीन तलाक के अभिशाप से मुक्ति और इससे इतर गले लगाने की छटपटाहट भी। राम के आसरे रामराज्य के सपने भी है और भगवा रंग देश के नक्शे में भरने की जल्दबाजी के बीच नैतिकता पर पर्दा डालने की मजबूरी भी। आजादी के बाद की नाकामी भी जताना है पर उसी मजबूत आधार पर बहुमंजिला विकास की रफ्तार भी गिनाना है। एक तरफ अटल की पाठशाला का जिक्र है जिसे उनके विरोधी भी ग्रहण करने से नही चूकना चाहते थे और एक तरफ भाषणों में जिक्र उस सोने की चिड़िया का है जो आजाद तो है पर बंदिशें परतंत्र घोषित करती है। एक तरफ देश के लिए राजनीति का जोश, सम्मान,गरिमा,सुचिता,साहस,त्याग है दूसरी तरफ विचारधारा की जीत के लिए देश दांव पर लगाने की जिद,एक तरफ गौरवशाली इतिहास बार बार कहता है देश नही इसके स्वर्णिम इतिहास को दोहराने की जरूरत है और एक तरफ देश बदलने लगातार जिक्र ??? कुर्सी ही सरकार है और सरकार के सत्ता में बने रहने का जुनून ,,,,,,,,,,,,अटल जी की पार्थिव देह पर सिसकियां भरने से अच्छा है अटल जी के व्यक्तित्व को विचारधारा का आधार बनाया जावें।
सांसे जिस्म छोड़ गई और जिस्म भी राख हो गया,
अटल थे,अटल है,अटल रहेंगें जो "भारत" हो गया।।
सादर नमन,,,,,,योगेश शर्मा,बनखेड़ी
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