लोकतंत्र की रक्षा कैसे होगी जब चुनावी घोषणाओं और जीतने की चाह में खोखले वादों के नाम पर एक निवाला दिखाकर सत्ता तक पहुंचने वर्तमान राजनीति परंपरा बन चली हैं। आम जनमानस ने भी यह मान लिया हैं कि लोकतंत्र में जनप्रतिंनिधि तो चुनना ही हैं फिर दो या चुनाव लड़ रहें उम्मीदवारों में थोड़ा अच्छा कौन हैं ? चूँकि व्यवहार और सादगी अच्छा प्रतिनिधत्व दे सकें यह जरूरी नही,समस्याओं को देखकर लाचार नजर आएं,समय पर बोलने से इतर शादी,विवाह और दुःख दर्द में उपस्थिति मात्र से वोट की जुगाड़ में रहें। आखिर चुनावी फिजा में जन्म लेते नेता भाग्य के सहारे सत्ता तक तो पहुंच सकते हैं पर स्वयं की ताकत का इस्तेमाल निजी हितों में लगाते हुए अवसरवादी साबित होते हैं। वह दिन कब आएगा जब जनता ही जनता के चुने नुमाइंदों से पूछने साहस कर सकेगी की आपकी योजना और क्षेत्र के लिए आपका लक्ष्य क्या हैं? चुनावी घोषणापत्र महज कागजी वादों का हिस्सा भर हैं जिसकी चिंता चुनाव जीतने के बाद नही की जाती। पांच वर्ष में से चार वर्ष सरकारी मलाई खाइए और अंतिम वर्ष फिर खोखले दावों और नये वादों के व्यंजन थाली में परोसकर अपनी चुनावी बिसात बिछा दीजिये।
मतदाता के पास चुनावी समय में आइना होता हैं बहुत थोड़े इस आईने को सत्ता को दिखाने साहस करते हैं पर बहुत बड़ी संख्या चुनावी वर्ष की गई अंधाधुंध घोषणाओं के लालच में फंसकर भूल जाते हैं कि जनता के सरोकार की याद तो चुनाव जीतने के पहले वर्ष में ही आ जाना था पर ऐंसा राजनीति में होता नही हैं क्यों ?
जवाव हम स्वयं हैं जो अपने अपने हिस्से की मलाई खाने के लिए स्वयं का सौदा राजनीतिक दलों से करते आये हैं। यही कारण हैं चुनावी वर्ष में प्रायोजित आंदोलन और इनसे नेताओं की विरादरी तैयार की जाती हैं पर स्वास्थ्य,शिक्षा,सरोकार,सड़क जेंसे मुद्दे छोटी छोटी लालच भरी घोषणाओं के चलते दम तोड़ देते हैं। बीते सात दशक से यही भारतीय राजनीति की तहजीब हैं जिसके चलते अवसर वाद के पर्याप्त अवसर सफेदपोश लिवाजों को मिलते रहते हैं जबकि मिलनसार,कद्दावर,जुझारू,कर्मठ,लोकप्रिय जेंसे शब्दों से इतर इन शब्दों के विपरीत हर पांच वर्ष में जनता का जनता के लिए जनता से संवाद तो होता हैं पर नतीजें नोटा पर बटन दबाने लायक ही हैं। यह अलग बात हैं राजनीति के बाजार की कामयाबी हर आम और ख़ास को अपनी ओर आकर्षित करने लगी हैं इसलिए हर एक के जहन में चुनाव चिन्ह की मोहर सी लगी हैं। वह तबका जिसके लिए विकास किसी भगवान की उपलब्धता से कम नही वह आज भी रेंगने मजबूर हैं। चुनाव में इस वोटबैंक को दरअसल खरीदा नही जाता बल्कि इसकी नीलामी कर दी जाती है और हालात वही एक रुपया केंद्र से चलकर जमीन पर आते आते 10 पैसे में बदल जाता हैं।
योगेश शर्मा,बनखेड़ी
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