राजनीति में रुतवा और कोरे वादों का दौर खत्म होने को हैं खासकर लोकसभा चुनाव 2014 के वादों,दावों और ख्याली शब्जबाग दिखाने भर का आंकलन करने के बाद। कछुआ चाल चलने वाले विकास की तुलना में फटाफट समीकरण बदलती राजनीति में परिणाम भी फटाफट मिलें यह हर कोई समझने लगा हैं। अभिनय कला के आधार पर मतदाता एक बार तो प्रभावित होकर ठगा जा सकता हैं पर बार बार नही। युवाओं के इर्द गिर्द बढ़ चले राजनीतिक दौर में बदलाव देखने की उत्सुकता एक बड़ी वजह बनकर उभरी हैं। परम्परागत वोट बैंक लगातार करवटें ले रहा हैं। जातिवाद की राजनीति हो या धर्म का राजनीतिक लाभ भी धीरे धीरे सिमटने से लगें हैं।
प्रतिष्ठा का सवाल बन चुके मध्यप्रदेश के उप चुनाव ने इशारों में ही सही यह तो बता दिया की चुनावी लाभ के लिए ताबड़तोड़ घोषणाओं से भी वोटर प्रभावित नही होता वह समझता हैं चार वर्षों तक राज करना और चार माह में वोटर को लुभाने का राजनीतिक पैंतरा अब पुराना हैं। स्मार्ट सिटी का जिक्र हो या किसानों के हित की नीतियां,बढ़ी हुई महंगाई में एन वक्त पर रियायत या शासकीय कर्मचारियों को प्रलोभन देना या फिर शिक्षा,बेरोजगारी का परम्परागत बजट के भाषणों में उल्लेख भी राजनीतिक लाभ की गारंटी हैं तय नही हैं। कांग्रेस की सिमटती जमीन को जीत की गारंटी मान बैठी भाजपा एक के बाद एक गलतियां करती रही तो कांग्रेस को जीवनदान मिलना भी तय हैं। क्योंकि सफलता के घोड़े पर सवार भाजपा में थोकबंद अवसरवादी कांग्रेसियों का आना भी भाजपा की रीति और नीति पर प्रहार ही साबित हुआ। सत्तर वर्ष की तुलना और भृष्टाचार को मुद्दा बनाकर सिंहासन पर बैठी भाजपा भूल गई की कांग्रेस मुक्त की जगह भृष्टाचार मुक्त का नारा ज्यादा कारगर होता। देश से गरीबी हटाओ का नारा जुमला था तो भाजपा की ओर से लगातार 2022 के श्रेष्ठ भारत का नारा भी गले नही उतरता क्योंकि परिणाम देने में देरी मतलब 2019 में चुनोती की ओर इशारा करती हैं। अब तक का आंकलन यही कहता हैं कि 2014 के चुनावी भाषणों में जिस भारत की कल्पना में डूबकर देश ने छप्परफाड़ बहुमत दिया उसके लिहाज से परिणामों में निराशा हाथ लगी हैं। भाजपा अपने उच्चतम शिखर पर हैं जहां से उसे नीचे ही आना हैं पर क्षेत्रीय छत्रप जिस तरह डूबते नजर आये उससे कांग्रेस ने सबक लिया तो फर्श से अर्श देखने की कल्पना कांग्रेस के लिए अतिश्योक्ति नही होगी यह भी गुजरात के परिणामों ने बता दिया हैं। आंकलन इस बात का भी होगा की कम बोलने वाले प्रधानमंत्री और ज्यादा बोलने वाले प्रधानमंत्री व्यक्तिगत श्रेष्ठता से ऊपर देश के लिहाज से कहाँ ठहरते हैं।
योगेश शर्मा,बनखेड़ी
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