बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- सरकारें कहती हैं हम किसान,मजदूर,आम आदमी की हितैषी हैं, विपक्ष यहां तक की हर संग़ठन समाज के इन्ही तबकों के लिए लड़ रहें हैं। फिर भी आम आदमी,किसान हताश क्यों हैं? सक्षम प्रतिनिधित्व इतना कमज़ोर क्यों हैं या फिर राजनीतिक लिहाज से झूंठे संघर्ष के जरिये नेतागिरी हर कोई चमकाना चाहता हैं। सवाल बेहद सीधा हैं स्थानीय निकाय,विधायक,सांसद,राज्य सरकार,केंद्र सरकार को हमने प्रतिनिधित्व सौंपा था। यह सोचकर की हमारा और हमारी वेदनाओं को व्यक्त करने हमने प्रतिनिधि नियुक्त किये हैं। पर ये क्या हम फिर नेतृत्व विहीन होकर भटकने लगें हैं। हर उम्मीद हमसे लगाकर सरकारें भी भीड़ में हर रोज नया शिगूफा छोड़कर भावनात्मक राजनीति करने लगी हैं।
कभी धर्म,देशभक्ति,कर्तव्य,के जरिये सरकारें खुद नेतृत्व छोड़कर आम जनमानस को नेतृत्व सौंपने की लगी हैं। वही नेतृत्व जिसमें जनता का जनता के लिए जनता द्वारा करार दिया जाता हैं पर हकीकत में उसके पास कुछ नही होता सिर्फ बार-बार प्रतिनिधि चुनकर आजमाने के अलावा। जिसे अवसर मिला उसने दोहन करके तिजोरियां भर ली,सत्ता के मद में सेवक से स्वयं सरकार बन गए। देश बदल रहा हैं क्योंकि खादी और सफेदी के मायने ही बदल गए। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का बाजारीकरण हो गया। देश तो वाकई बदल रहा हैं जहां स्पष्ट कुछ नही हैं। पर्दे के पीछे सभी किरदार एक मकसद हो चले हैं। सामने बैठे दर्शक तो किसी मनोरंजन के आदी हैं। कल सब भूलकर फिर उसी भीड़ में खो जाएंगे जिस भीड़ की आड़ में राजनीति नस्लें रोज जन्म लेती हैं।
देश की चिंता देशभक्ति हैं पर सिर्फ मंचों पर चिंता व्यक्त कर विलासिता भरे माहौल में सरहदों की तकलीफ का अंदाजा नही लगाया जा सकता। मीडिया भी वही दिखाने लगा हैं जो नेता देखना चाहते हैं। नर्मदा और गंगा की पवित्रता पर किसी को कोई संशय नही पर इनके लगातार दोहन के दोषी कौन हैं? आत्मा को छलनी छलनी कर कहा जाता हैं यह पवित्र हैं। लगातार रेत उत्खनन पर मै भी कुछ नही कहूँगा। चार शब्द लिखकर मै भी चिंतन व्यक्त करूँगा और सो जाऊँगा,,,,,,,,कहाँ गया प्रतिनिधित्व,कौन करेगा नेतृत्व, आम आदमी की अगुवाई की चिंता सभी को हैं पर सोच बदल गई,राजनीति बदल गई ,प्रथम पंक्ति ही कमजोर हो गई या नेतृत्व की नियत बदल गई तो देश तो बदलेगा ही। हम नही बदलेंगे क्योंकि नेत्रविहीन भीड़ तो भेड़चाल ही हैं। कोई मकसद हमारा हैं ही नही क्योंकि हम तो स्वयं सियासत का मकसद बनने अवसर बन गए हैं। नोटबंदी के मकसद कागजों पर अच्छे भी हों तो क्या फर्क पड़ता हैं जमीन पर तो अब भी आजादी पूरी नही कही जा सकती,,,,,,,,,,।