बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

दावों पर चलती राजनीति के दिन लदे,,,,,

राजनीति में रुतवा और कोरे वादों का दौर खत्म होने को हैं खासकर लोकसभा चुनाव 2014 के वादों,दावों और ख्याली शब्जबाग दिखाने भर का आंकलन करने के बाद। कछुआ चाल चलने वाले विकास की तुलना में फटाफट समीकरण बदलती राजनीति में परिणाम भी फटाफट मिलें यह हर कोई समझने लगा हैं। अभिनय कला के आधार पर मतदाता एक बार तो प्रभावित होकर ठगा जा सकता हैं पर बार बार नही। युवाओं के इर्द गिर्द बढ़ चले राजनीतिक दौर में बदलाव देखने की उत्सुकता एक बड़ी वजह बनकर उभरी हैं। परम्परागत वोट बैंक लगातार करवटें ले रहा हैं। जातिवाद की राजनीति हो या धर्म का राजनीतिक लाभ भी धीरे धीरे सिमटने से लगें हैं।
प्रतिष्ठा का सवाल बन चुके मध्यप्रदेश के उप चुनाव ने इशारों में ही सही यह तो बता दिया की चुनावी लाभ के लिए ताबड़तोड़ घोषणाओं से भी वोटर प्रभावित नही होता वह समझता हैं चार वर्षों तक राज करना और चार माह में वोटर को लुभाने का राजनीतिक पैंतरा अब पुराना हैं। स्मार्ट सिटी का जिक्र हो या किसानों के हित की नीतियां,बढ़ी हुई महंगाई में एन वक्त पर रियायत या शासकीय कर्मचारियों को प्रलोभन देना या फिर शिक्षा,बेरोजगारी का परम्परागत बजट के भाषणों में उल्लेख भी राजनीतिक लाभ की गारंटी हैं तय नही हैं। कांग्रेस की सिमटती जमीन को जीत की गारंटी मान बैठी भाजपा एक के बाद एक गलतियां करती रही तो कांग्रेस को जीवनदान मिलना भी तय हैं। क्योंकि सफलता के घोड़े पर सवार भाजपा में थोकबंद अवसरवादी कांग्रेसियों का आना भी भाजपा की रीति और नीति पर प्रहार ही साबित हुआ। सत्तर वर्ष की तुलना और भृष्टाचार को मुद्दा बनाकर सिंहासन पर बैठी भाजपा भूल गई की कांग्रेस मुक्त की जगह भृष्टाचार मुक्त का नारा ज्यादा कारगर होता। देश से गरीबी हटाओ का नारा जुमला था तो भाजपा की ओर से लगातार 2022 के श्रेष्ठ भारत का नारा भी गले नही उतरता क्योंकि परिणाम देने में देरी मतलब 2019 में चुनोती की ओर इशारा करती हैं। अब तक का आंकलन यही कहता हैं कि 2014 के चुनावी भाषणों में जिस भारत की कल्पना में डूबकर देश ने छप्परफाड़ बहुमत दिया उसके लिहाज से परिणामों में निराशा हाथ लगी हैं। भाजपा अपने उच्चतम शिखर पर हैं जहां से उसे नीचे ही आना हैं पर क्षेत्रीय छत्रप जिस तरह डूबते नजर आये उससे कांग्रेस ने सबक लिया तो फर्श से अर्श  देखने की कल्पना कांग्रेस के लिए अतिश्योक्ति नही होगी यह भी गुजरात के परिणामों ने बता दिया हैं। आंकलन इस बात का भी होगा की कम बोलने वाले प्रधानमंत्री और ज्यादा बोलने वाले प्रधानमंत्री व्यक्तिगत श्रेष्ठता से ऊपर देश के लिहाज से कहाँ ठहरते हैं।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी
स्वतंत्र विचार आपके अवलोकनार्थ

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

ट्रेन स्टॉपेज नही तो drm ऑफिस के बाहर करेंगे निर्जला अनशन

प्रति,
पीयूष गोयल,
रेलमंत्री, भारत सरकार
नई दिल्ली

विषय - बनखेड़ी bkh पर 12159 - 60 के ठहराव के विषय में।

महोदयजी,

विदित हो की बनखेड़ी रेलवे स्टेशन पर रात्रिकालीन ट्रेन स्टॉपेज की मांग विगत 10 वर्षों से अनवरत जारी हैं। इसी मांग को वाकायदा लोकसभा में सांसद राव उदयप्रताप सिंह द्वारा रखा जा चुका हैं जबकि सांसद की उचित मांग के समर्थन में 9 एवं 10 दिसंबर 2017 को दो दिवसीय निर्जला अनशन मेरे द्वारा शांतिपूर्ण तौर पर रेलवे परिषर में किया जा चुका हैं। जबलपुर रेल मंडल द्वारा उक्त प्रस्ताव को रेलवे बोर्ड अनुमति हेतु 12 दिसंबर 2017 को भेजते हुए उक्त तारीख से 3 माह की अधिकतम अवधि लिखित रूप से मुझे बतौर आस्वासन दिया गया था जो 12 मार्च 2018 को पूर्ण होगी।
माननीय रेल मंत्री जी आपसे विनम्रता पूर्वक आग्रह हैं कि बनखेड़ी तहसील का नगर परिषद मुख्यालय जो 150 गावँ,डेढ़ लाख से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता हैं। स्वास्थ्य,शिक्षा,आवागमन के लिहाज से रेल विभाग पर आश्रित हैं पर बनखेड़ी रेलवे स्टेशन पर रात्रि 8 बजे से सुबह 6 बजे यानी 10 घँटे कोई भी ट्रेन का स्टॉपेज नही हैं। स्वास्थ्य लाभ हेतु जबलपुर रेल मंडल से क्षेत्र को लाभांवित करने चलाई जाने वाली जबलपुर- अमरावती 12159 - 60 ट्रेन का अविलंब स्टॉपेज देने की कृपा करेंगें।

महोदय जी उक्त मांग का एक माह के भीतर ट्रेन स्टापेज न होने की स्थिति में जबलपुर डीआरएम कार्यालय के बाहर पुनः अनिश्चितकालीन निर्जला अनशन करने बाध्य हूँ।

उचित विनय सेवा में प्रस्तुत हैं।

निवेदन
योगेश शर्मा,बनखेड़ी
जिला- होशंगाबाद मप्र

प्रतिलिपि -
जनरल मैनेजर पश्चिममध्य रेल
डीआरएम जबलपुर

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

आइना बनकर अड़ना और लड़ना होगा,,,,

लोकतंत्र की रक्षा कैसे होगी जब चुनावी घोषणाओं और  जीतने की चाह में खोखले वादों के नाम पर एक निवाला दिखाकर सत्ता तक पहुंचने वर्तमान राजनीति परंपरा बन चली हैं। आम जनमानस ने भी यह मान लिया हैं कि लोकतंत्र में जनप्रतिंनिधि तो चुनना ही हैं फिर दो या चुनाव लड़ रहें उम्मीदवारों में थोड़ा अच्छा कौन हैं ? चूँकि व्यवहार और सादगी अच्छा प्रतिनिधत्व दे सकें यह जरूरी नही,समस्याओं को देखकर लाचार नजर आएं,समय पर बोलने से इतर शादी,विवाह और दुःख दर्द में उपस्थिति मात्र से वोट की जुगाड़ में रहें। आखिर चुनावी फिजा में जन्म लेते नेता भाग्य के सहारे सत्ता तक तो पहुंच सकते हैं पर स्वयं की ताकत का इस्तेमाल निजी हितों में लगाते हुए अवसरवादी साबित होते हैं। वह दिन कब आएगा जब जनता ही जनता के चुने नुमाइंदों से पूछने साहस कर सकेगी की आपकी योजना और क्षेत्र के लिए आपका लक्ष्य क्या हैं? चुनावी घोषणापत्र महज कागजी वादों का हिस्सा भर हैं जिसकी चिंता चुनाव जीतने के बाद नही की जाती। पांच वर्ष में से चार वर्ष सरकारी मलाई खाइए और अंतिम वर्ष फिर खोखले दावों और नये वादों के व्यंजन थाली में परोसकर अपनी चुनावी बिसात बिछा दीजिये।
मतदाता के पास चुनावी समय में आइना होता हैं बहुत थोड़े इस आईने को सत्ता को दिखाने साहस करते हैं पर बहुत बड़ी संख्या चुनावी वर्ष की गई अंधाधुंध घोषणाओं के लालच में फंसकर भूल जाते हैं कि जनता के सरोकार की याद तो चुनाव जीतने के पहले वर्ष में ही आ जाना था पर ऐंसा राजनीति में होता नही हैं क्यों ?
जवाव हम स्वयं हैं जो अपने अपने हिस्से की मलाई खाने के लिए स्वयं का सौदा राजनीतिक दलों से करते आये हैं। यही कारण हैं चुनावी वर्ष में प्रायोजित आंदोलन और इनसे नेताओं की विरादरी तैयार की जाती हैं पर स्वास्थ्य,शिक्षा,सरोकार,सड़क जेंसे मुद्दे छोटी छोटी लालच भरी घोषणाओं के चलते दम तोड़ देते हैं। बीते सात दशक से यही भारतीय राजनीति की तहजीब हैं जिसके चलते अवसर वाद के पर्याप्त अवसर सफेदपोश लिवाजों को मिलते रहते हैं जबकि मिलनसार,कद्दावर,जुझारू,कर्मठ,लोकप्रिय जेंसे शब्दों से इतर इन शब्दों के विपरीत हर पांच वर्ष में जनता का जनता के लिए जनता से संवाद तो होता हैं पर नतीजें नोटा पर बटन दबाने लायक ही हैं। यह अलग बात हैं राजनीति के बाजार की कामयाबी हर आम और ख़ास को अपनी ओर आकर्षित करने लगी हैं इसलिए हर एक के जहन में चुनाव चिन्ह की मोहर सी लगी हैं। वह तबका जिसके लिए विकास किसी भगवान की उपलब्धता से कम नही वह आज भी रेंगने मजबूर हैं। चुनाव में इस वोटबैंक को दरअसल खरीदा नही जाता बल्कि इसकी नीलामी कर दी जाती है और हालात वही एक रुपया केंद्र से चलकर जमीन पर आते आते 10 पैसे में बदल जाता हैं।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बढ़ती हुई आत्महत्या समाज में व्याप्त कुंठा

समाज के हर वर्ग में बढ़ती हुई आत्महत्या बताती हैं कि  मानसिक रूप से दुर्बलता क्या होती हैं। आखिर क्यों निराशा के अंधेरे इतने घनघोर हो जाते हैं कि जीवन समाप्त कर चुनोतियों के आगे हथियार डाल दिए जाते हैं। क्या वर्तमान की चकाचौन्ध में स्वयं को ठगा महसूस कर लेना या अपेक्षाओं के बोझ से घबराकर मुक्त होने की चाहत मौत की ओर आकर्षित करती हैं। उम्र का हर पड़ाव बड़ी जवावदेही की ओर इशारा करता हैं पर उम्र के  कितनी परिपक्व दौर में कितनी अपेक्षाएं पाली गई हैं या कितना मानसिक लोड वहन करने की स्थिति हैं यह आंकलन बेहद जरूरी हैं।

अमूनन बच्चों से किताबी ज्ञान,होमवर्क से इतर रेंक को अभिभावकों के द्वारा तरहीज देना,युवाओं पर बहुत अच्छे कॉलेज में दाखिला और जॉब स्टेटस को तवज्जों देना। यह सब जानते हुए की हर हुनर में अच्छा भविष्य देने की क्षमता हैं एवं हर तरह की योग्यता के लिहाज से फील्ड चुनने अभिभावक भी महत्वपुर्ण किरदार हैं। इसके अलावा अच्छे ओदे को क्षमता की दहलीज को लांघकर प्रदर्शित करने की चाह भी मानवीय जीवन को उलझन देने काफी हैं। इन सबसे अलग बात जो महसूस करने की जरूरत हैं हम स्वयं असंतुष्ट रहते हुए दूसरों को वह झूठ परोस देते हैं जो सच के इर्द गिर्द भी नही ठहरता। इसका आंकलन आत्मबोध से समझा जा सकता हैं। हमारे द्वारा दिखावा असल में स्वयं को संतुष्ट कर ही नही सकता चूँकि यही नकलीपन हमारी असल कुंठा का जन्मदाता हैं।

आत्महत्या जेंसे लाचार,असहाय,निराश,कुंठित,जीवन से थके हुए कदम के पीछे साहस केंसे जन्म ले यह विचारनीय हैं। जिसके लिए जरूरी हैं हम स्वयं के द्वारा निर्मित नकलीपन के चक्रव्यूह को तोड़े। यह तब संभव हैं जब हम व्यक्तित्व के ठोस निर्माण को तरहीज दे।

हम आज के दौर में उस चकाचोंध की चपेट में हैं जिसे समझने का न साहस हैं न स्वीकार करने योग्य मानसिकता। हर पहलू  को  दूर एवं पास की असल नजर से देखने की जरूरत हैं चूँकि दूर से कमियां कम नजर आती हैं। ठीक वैसे ही जेंसे लिवाज से व्यक्तित्व की पहचान करना आज के दौर में बेहद कठिन होता जा रहा हैं।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी