शनिवार, 24 दिसंबर 2016

क्या प्रतिनिधित्व कही खो-सा गया हैं?

बनखेड़ी (योगेश शर्मा)- सरकारें कहती हैं हम किसान,मजदूर,आम आदमी की हितैषी हैं, विपक्ष यहां तक की हर संग़ठन समाज के इन्ही तबकों के लिए लड़ रहें हैं। फिर भी आम आदमी,किसान हताश क्यों हैं? सक्षम प्रतिनिधित्व इतना कमज़ोर क्यों हैं या फिर राजनीतिक लिहाज से झूंठे संघर्ष के जरिये नेतागिरी हर कोई चमकाना चाहता हैं। सवाल बेहद सीधा हैं स्थानीय निकाय,विधायक,सांसद,राज्य सरकार,केंद्र सरकार को हमने प्रतिनिधित्व सौंपा था। यह सोचकर की हमारा और हमारी वेदनाओं को व्यक्त करने हमने प्रतिनिधि नियुक्त किये हैं। पर ये क्या हम फिर नेतृत्व विहीन होकर भटकने लगें हैं। हर उम्मीद हमसे  लगाकर सरकारें भी भीड़ में हर रोज नया शिगूफा छोड़कर भावनात्मक राजनीति करने लगी हैं।

कभी धर्म,देशभक्ति,कर्तव्य,के जरिये सरकारें खुद नेतृत्व छोड़कर आम जनमानस को नेतृत्व सौंपने की लगी हैं। वही नेतृत्व जिसमें जनता का जनता के लिए जनता द्वारा करार दिया जाता हैं पर हकीकत में उसके पास कुछ नही होता सिर्फ बार-बार प्रतिनिधि चुनकर आजमाने के अलावा। जिसे अवसर मिला उसने दोहन करके तिजोरियां भर ली,सत्ता के मद में सेवक से स्वयं सरकार बन गए। देश बदल रहा हैं क्योंकि खादी और सफेदी के मायने ही बदल गए। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का बाजारीकरण हो गया। देश तो वाकई बदल रहा हैं जहां स्पष्ट कुछ नही हैं। पर्दे के पीछे सभी किरदार एक मकसद हो चले हैं। सामने बैठे दर्शक तो किसी मनोरंजन के आदी हैं। कल सब भूलकर फिर  उसी भीड़ में खो जाएंगे जिस भीड़ की आड़ में राजनीति नस्लें रोज जन्म लेती हैं।

देश की चिंता देशभक्ति हैं पर सिर्फ मंचों पर चिंता व्यक्त कर विलासिता भरे माहौल में सरहदों की तकलीफ का अंदाजा नही लगाया जा सकता। मीडिया भी वही दिखाने लगा हैं जो नेता देखना चाहते हैं। नर्मदा और गंगा की पवित्रता पर किसी को कोई संशय नही पर इनके लगातार दोहन के दोषी कौन हैं? आत्मा को छलनी छलनी कर  कहा जाता हैं यह पवित्र हैं। लगातार रेत उत्खनन पर मै भी कुछ नही कहूँगा। चार शब्द लिखकर मै भी चिंतन व्यक्त करूँगा और सो जाऊँगा,,,,,,,,कहाँ गया प्रतिनिधित्व,कौन करेगा नेतृत्व, आम आदमी की अगुवाई की चिंता सभी को हैं पर सोच बदल गई,राजनीति बदल गई ,प्रथम पंक्ति ही कमजोर हो गई या नेतृत्व की नियत बदल गई तो देश तो बदलेगा ही। हम नही बदलेंगे क्योंकि नेत्रविहीन भीड़ तो भेड़चाल ही हैं। कोई मकसद हमारा हैं ही नही क्योंकि हम तो स्वयं सियासत का मकसद बनने अवसर बन गए हैं। नोटबंदी के मकसद कागजों पर अच्छे भी हों तो क्या फर्क पड़ता हैं जमीन पर तो अब भी आजादी पूरी नही कही जा सकती,,,,,,,,,,।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

हकीकत तो यही हैं

बरसात तो हुई हैं मगर पानी कहाँ हैं,
आँख तो रोई हैं मगर पानी कहाँ हैं।।

ठहरा हुआ हैं पानी,मगर वो बात कहाँ हैं,
बह तो रही हैं नदी,मगर वो साज कहाँ हैं।।

यूँ तो समुंदर में पानी ही पानी हैं,
प्यास किसी की बुझा दे वो बात कहाँ हैं।।

यूँ तो तन पर उजले कपड़े हैं,
मन को रौशन कर दे वो सफेदी कहाँ हैं।।

चेहरे की खूबसूरती भर काफी नही,
किसी की दुनियां संवर जाएं वो "जज्बात" कहाँ हैं।।

परिंदों की तालीम हम से अच्छी हैं,
उड़ने के बाद जमीं पर ठहरें वो इंसान कहाँ हैं।

सिर्फ नोटबंदी से कालापन नही जाएगा,
सफेदी छोड़ दे कालिख,वो सियासत कहां हैं।

यूँ तो ताजमहल बहुत अच्छे हैं,
जीते जी एक मकां मिल जाएं शाहजहाँ कहाँ हैं।।

बात में बात हो बात से बात बने,
बात सुनकर बात कहने का अंदाज कहाँ हैं।।

रचना- योगेश शर्मा,बनखेड़ी

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

क्या फिर विनम्रता रंग लाएगी?

बनखेड़ी- ट्रेन स्टॉपेज की फिर उम्मीद जगी हैं। संघर्ष समीति ने बाजार बंद और धरने को वापस ले लिया। नगर के बुजुर्ग और जनप्रतिनिधियों की सलाह और सुझाव पर पनप रहा आक्रोश फिलहाल अचानक कम हो गया। क्योंकि उम्मीद पहले से कई गुना बड़ गई। क्षेत्र के लाखों लोग और हजारों युवाओं की भावनाओं से जुडी यह मांग कब तक पूरी होगी यह सवाल हर जहन में खड़ा हो चला हैं।
सांसद महोदय के लेटर में सोहागपुर और करेली के बीच बनखेड़ी पर रेल विभाग मेहरबान होगा या नही फिलहाल कहना मुश्किल हैं। रेलवे विभाग की नजरों में बनखेड़ी क्षेत्र की व्यापकता और आवागमन के लिहाज से आत्मनिर्भरता को तरहीज देगा। या फिर पहले से संपन्न रेलवे स्टेशनों की चकाचोंध में बनखेड़ी का अंधियारा गुम हो जाएगा ? सवाल बहुतेरे हैं। पर इतना यकीन से कहा जा सकता हैं की अब अगर नही सुना गया तो हजारों युवाओं के आक्रोश से रेल विभाग को दो दो हाथ तो करने ही होंगे। एक हद तक विनम्रता को कमजोरी समझने की भूल दुगने आक्रोश को जन्म देती हैं। वैसे भी समय सीमा की बात करें तो हर लिहाज से बनखेड़ी क्षेत्र की ओर से दिया जा चुका हैं। ऐसे में एक और उम्मीद टूटना न्यायसंगत नही हैं। रेल विभाग के मुखिया बनखेड़ी की जरूरत को भले ही न समझें पर जनप्रतिनिधियों को अच्छी तरह से मालूम हैं की यह मुद्दा अब कमजोर नही होगा। बल्कि समय रहते परिणाम न आने पर यह मुद्दा सड़को पर आक्रोश बनकर उतर सकता हैं। क्योंकि सत्ता से जुडी मानसिकता हो या विपक्ष ट्रेन स्टॉपेज के समर्थन में खड़े  हैं। हर युवा कब तक मन समझाएगा,कब तक किसी विचारधारा के साथ भीड़ का हिस्सा बनेगा। खेर यह सब सोचकर मनोबल क्यों तोड़ा जाए जबकि हर आम युवा ट्रेन स्टॉपेज की अधिकृत घोषणा की राह बड़ी बेसब्री से देख रहा हैं। उम्मीद भी यही हैं की यह सौगात 2016 के जाते जाते ही सही इस साल को यादगार बना दे।