बुधवार, 22 अगस्त 2018

ट्रेन स्टॉपेज का संघर्ष एक आत्मकथा एक व्यथा


"घर से निकलें की कोई तो शुरुआत करें,
मंजिल मिलें न मिलें खुद को खुद से क्यों निराश करें।।"
आप बीता सच,,,,,,,         ट्रेन स्टॉपेज एक ऐसी जिद जिसने वह सब कुछ अहसास कराया जिसे सीखने उम्र गुजर जाती है। कहाँ झुकना है,कहाँ अड़ना है,कहाँ विनम्र होकर जीत के लिए हार जाना है। और कहां किसकी सलाह मानना है,किस पर भरोषा किया जा सकता है तथा किसकी बातें गम्भीरता से लेना है। बहुत कुछ सीखा सबसे खास यह कि अपनी सरजमीं के लिए दिल से लड़ने का सौभाग्य किसी किसी नसीब वाले को मिलता है। 2015 अक्टूबर माह में पहली बार दहलीज से निकलकर बनखेड़ी ट्रेन स्टॉपेज लेने की जिद की तरफ पहला कदम बढ़ाया था। इससे पूर्व छोटे भाई पंकज खटीक ने अच्छी पहल करते हुए मीटिंग बुलाई थी पर वही राग 3 से 4 ट्रेन की बेतुकी मांग जो संभव ही नही क्योंकि पहली लड़ाई रेवेन्यू,पर्याप्त यात्री,बड़ा क्षेत्र होने का अहसास रेलवे को कराना था। तब जबकि रेलवे के पास उस समय बनखेड़ी ग्राम पंचायत एवं पुरानी आबादी की छोटी स्टेशन की कुंडली थी जिसे अपडेट कराना भी चुनोती से कम न था। उस दिन ऐसा लगा भीड़ के साथ निर्णय पर नही पहुंचा जा सकता बल्कि क्रमिक और ठोस लड़ाई लड़नी होगी। यहाँ से इस मांग को वजनदार बनाने प्रयाश किये। परंपरागत तरीकों से अलग युवाओं को साथ लाने बार बार बनखेड़ी के सम्मान के जरिये कोशिश की पर राजनीति के  इरादों को टोटलने में हार गए क्योंकि हर जगह विचारधारा की बेड़ियां लोगों को कदम पीछे खींचने मजबूर करती है। एक वजह यह भी थी बनखेड़ी का नेतृत्व इतना असरदार नही रहा कि उसपर भरोषा किया जाये। जिनपर भरोषा किया जा सकता था वे आगे ही नही आना चाहते थे। लड़ने आमदा थे उनकी कोई पहचान नही थी और हम उसी श्रेणी के  चंद लोग कोशिश करते रहें लोगों को जोड़ने की। लड़ाई और संघर्ष को निर्णायक बनाया जाये पर पीछे चंद लोगों के अलावा मायुष करने असरहीन और बगैर सकारात्मक सोच लिए भीड़ खड़ी थी जो साथ होकर भी साथ देने की गारंटी नही थीं। सांसद महोदय द्वारा संसद में मांग उठी तो कुछ उम्मीद बंधी पर समय निकलता रहा परिणाम नही मिले मुद्दे को मरने से बचाना था सबको बहुत टटोला पर नतीजा उसी तरफ जाता दिखा जहां किसी एक आदमी के इर्द गिर्द मांग सिर्फ मांग ही रह जाती। संघर्ष समिति के जरिये कुछ कदम आगे बढ़े पर जब सार्वजनिक मीटिंग से जो कुछ निकला वह वही निर्णय थे जो कई बार किये जा चुके थे। उस निर्णय को मैं स्वीकार नही कर सका और अपनों से बगावत कर डाली क्योंकि संसद में उठी मांग के दौरान उस गुस्से का जिक्र था जिसे बनखेड़ी ने कभी जताया ही नही,,,,,
"वादे थे पर दावे अधूरे निकलें,
इरादे सियासत की ओर जाते निकले।।
आरजू थी सभी की पर पहल कौन करें,
माँ का सिर पर हाथ था फिर किसी से क्यों डरें।।"
निर्जला व्रत का निर्णय लिया खुशकिस्मती से परिवार इस निर्णय में मेरे साथ था। जब अपने इरादे जाहिर किये तो अपनों की नाराजगी,डर पैदा करने साजिशें,श्रेय लेने के लांछन लगने शुरू हुए जो जिसका अहसास और आशंका थी। पर मित्र,बड़े भाई,शुभचिंतक बार बार होंसला दे रहे थे तब तक वाकई ट्रेन स्टॉपेज की बातें महज हवाहवाई थी यहां तक जबलपुर रेल मंडल ने प्रस्ताव भी नही दिया था। 10 दिसंबर की सुबह मेरे लिए बहुत खास थी क्योंकि बस्ती के लिए संघर्ष करने एक तरफ उत्साह था तो दूसरी तरफ राजनीत से इस मुद्दे को बचाने का दवाव,,,,,,,,,,,,अनशन शुरु हुआ तो वे पांच लोग मेरे साथ खुलकर आये जिन्होंने अपनी मानसिकता को खूंटी पर टांगते हुए जनहित में संघर्ष के साथ आना पसंद किया। संकटमोचन हनुमान जी के समक्ष संकल्प लिया तो इरादे और फौलादी बन गए। कुछ बड़े कद के लोगों ने और हमारे बड़े भाइयों ने राजनीति से हटकर गैर राजनीतिक अनशन का माहौल बनाने अहम भूमिका निभाई।   एक दिन गुजरा तो दूसरे दिन हमें उन सबका साथ मिलना शुरू हुआ जिन्होंने हमें ईमानदार समझा। बाजार बंद हुआ व्यापारी साथ खड़े होते चले गए। निर्जला अनशन पवित्र था इसलिए पूरे 50 से 52 घँटे संकल्प के साथ पूरा किया। इस बीच उन घटनाओं का जिक्र नही करूँगा जो मेरे व्यक्तिगत जीवन मे भविष्य की बाधा साबित होती नजर आईं। रेल प्रशासन ने पहली बार बनखेड़ी को और मांग को गम्भीरता से लिये। जबलपुर मण्डल ने उसी दिन जबलपर नागपुर अमरावती ट्रेन के प्रस्ताव को रेलवे बोर्ड भेज दिया। बस यहां मलाल इस बात का रहा यदि उस दौरान वे लोग जो मेरे निर्णय को व्यक्तिगत अपमान या नेतागिरी समझ रहें थे साथ खड़े हो जाते तो उसी दिन यह मांग पूरी हो सकती थी। सांसद की मांग के समर्थन में बैठे थे उम्मीद और यकीन था सांसद मौके पर पहुंचकर हमारा समर्थन करते हुए निर्णायक पहल करेंगें पर यह नही हो सका बहुत से कारण थे बहुत से लोगों की उस वक्त नकारात्मक भूमिका विभीषण सी क्यों थी यह सवाल मेरे सामने आज भी है और हमेशा रहेगा। खैर यह हमारी बड़ी जीत थी जिससे उम्मीद मिल चुकी थी,,,,,,,,अब बारी सांसद महोदय की थी जिन्हें इस अनशन ने मजबूती दी जिससे इस मांग को उन्हें रेलवे के समक्ष असरदार बनानी थी क्योंकि संसद भवन में उनकी मांग उनके लिए भी प्रतिष्ठा थी। सांसद को पूरा श्रेय जाता है क्योंकि वे बड़े और ऊर्जावान जनप्रतिनिधि है यही कारण है तमाम कोशिशों के वावजूद उनके प्रति सम्मान भी बड़ा और उनका स्नेह भी मिला। इन सबके बीच उन किरदारों के जिक्र भी करना चाहता हूं जिन्होंने हर जोखिम से लड़ने साहस दिया,बगैर किसी नाम की चाहत के निर्जला अनशन के वक्त खुद को झोंक दिया बहुत मेहनत की। यहां तक कड़कड़ाती ठंड में उनकी आंखों से नींद गायब थी वे घर मे रहते हुए हमारे लिए चिंतित थे। हर वक्त हमारे स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे ऐंसे वे लोग बहुत संख्या में थे जिनका नाम नही लूंगा पर उन तक मेरा प्रणाम,आभार,धन्यवाद अपने आप पहुंच जाएगा परिणाम सामने है बनखेड़ी क्षेत्र की बहुप्रतीक्षित मांग आज पूरी हुई। ट्रेन के रुकते ही एक सपना पूरा हुआ। अब अगर बेहतर रेवेन्यू मिलेगा तो अन्यअगली डाउन तरफ से रात्रिकालीन ट्रेन भी मिल जाएगी क्योंकि दरकार दोनों दिशाओं से रात्रि के वक्त जुड़ने की है।
"ये और बात है कि वो कोशिश गुजरा जमाना हो गई,
कोशिश करने वालों की इक जिद,तमन्ना पूरी हो गई।।"
भले आज उस अनशन की चमक राजनीतिक मंच के चलते दब गई हो पर यह इतिहास बनकर रहेगा कि कभी जनहित के लिए आम आदमी जिद्दी बनकर अड़े थे। भविष्य में जनहित के लिए लड़कर मकसद हासिल करने उन किरदारों को मजबूर होना होगा जो राजनीति को प्रतिष्ठा मान बैठें। संदेश जैन जो सत्ता पक्ष की पार्टी के युवा है उन्होंने इस संघर्ष के जरिये जनहित से जुड़ने साहसी कदम उठाया,पंकज खटीक जो शुरू से अंत तक बखूबी प्रतिनिधित्व करते रहें,प्रदीप पलिया एक ऊर्जावान युवा जिसने क्षेत्र की लड़ाई में साथ खड़ा होना ज्यादा बेहतर समझा,जितेंद्र भार्गव एक जुझारू और संघर्षशील किसान नेता जिसने सदैव इस मुहिम में सहयोग किया,घनश्याम कीर बगैर किसी नाम की चाहत के पूर्ण रूपेण निर्जला अनशन किया,गेंदीलाल पटैल जो अन्य राजनीतिक दल के उभरते नेता है उम्र में हमसे बड़े है पर राजनीति से दूर शानदार भूमिका निभाई,गजेंद्र पटैल छोटा भाई और शानदार निडर पत्रकार जिसने खामोशी से कुशल रणनीति बनाने भूमिका निभाई,विशेष भार्गव एक ऐंसा युवा हरफनमौला किरदार जिसने अपनी जॉब से तीन दिन अवकाश लेकर अनशन के प्रबंधन की भूमिका निभाई,निरंजन शर्मा जो रात को चिंतित होकर हमारे साथ आकर बैठ जाया करते थे और हमारे स्वास्थ्य और किसी अप्रिय घटना को लेकर चिंचित रहते और लगातार सावधान करते थे। एक और किरदार ओम प्रकाश सातल जिन्होंने रेलवे से जुड़ी जानकारियों से लगातार अवगत कराते हुए कागजी कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इन मिले जुले प्रयाशों से मेहनत रंग लाई है पर अभी ट्रेन के स्थायी ठहराव तक जिम्मेदारी सभी को रेवेन्यू बढ़ाने मदद के रूप में करनी होगी।
काफ़िलें बने वो घर से निकलते रहें,
रहें पर्दे के पीछे पर हमारे खातिर दुआ करते रहें।।
  वे लोग है जिनके साथ और समर्थन के बगैर मेरा साहस दम तोड़ देता पर इन साथियों को बहुत बहुत विन्रम आभार देने का समय आ गया। फिर किसी संघर्ष में बगैर राजनीति के लड़ने का जज्बा कायम रहें यह शक्ति परमात्मा देता रहें।
मित्र,यार,बड़े भाई,परिवार,नगर एवं वे महिलाएं जिन्होंने लोगों को घर से निकलकर संघर्ष का गवाह बनने प्रेरित किया वे सब इस जीत के प्रथम हकदार है।
दिल भी दुःख जाते है,कुछ अपने छूट जाते है ,,,,,,,
महफूज रहें बस्ती की आबरू इससे बड़ा धर्म नही है।।
अंत में माफी चाहता हूं जिन अपनों का इसलिए दिल दुखाया क्योंकि कई बार निर्णय भावनाओं में नही बल्कि रणनीति के लिए लेने होते है। रणनीति जब क्षेत्र की भलाई के लिए बनाई जाएं तो गलत नही होती न इरादे गलत होते। मांग को चर्चा और सुर्खियां मिलें इसलिए योजनाबद्ध विरोध भी रणनीति का हिस्सा होते है यही वजह है जोखिम लेना अच्छा होता है जब परिणाम क्षेत्र के हित मे आने की गारंटी हो और यह हुआ है कम से कम हजारों लोग जो वर्षो से इस सुविधा के आभाव में कष्ट उठाते थे वह आज खुश है और शुक्रिया उस ईश्वर का जिसनें इस संघर्ष में एक किरदार निभाने का सुअवसर दिया। इस खुशी को व्यक्त करने का मजा मौन और गुमनामी में लेना चाहते है बनखेड़ी अगर मॉ है तो इस रिश्ते से इस जीत की हकदार बनखेड़ी ही है। धन्यवाद  ,,,,,,,
साभार - योगेश शर्मा बनखेड़ी

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

इस अंधेरें का तिलिस्म कौन तोड़ेगा ????

योगेश शर्मा - देश शोक में डूबा हुआ है क्योंकि राजनीतिक आदर्श का वो सूरज अस्त हो चुका है अब कृत्रिम रोशनी से अंधेरा भले छट जाए पर अंधेरें का तिलिस्म कौन सा चिराग तोड़ेगा यह प्रश्न तो जरूर उठेगा और चिंतन भी करना ही होगा। अपने राजनीतिक जीवन में देश और लोकतंत्र को पार्टी से ऊपर रखने वाले अटल बिहारी बाजपेयी वर्तमान राजनीति परिदृश्य को आइना तो दिखा गए। यह बात हर जहन में है  अटल क्यों सर्वमान्य नेता कहलाएं ? संसद की मर्यादा को जीवित रखने अटल सत्य तब भी गौरवशाली रहा और अब जबकि  दिवंगत आत्मा की अमिट आवाज  गूंजते शब्दों से अब भी सदन स्वयं को गौरवशाली महसूस करेगा।विपक्ष को वह आदर सम्मान जो अटल युग में परंपरा बना क्योंकि तब की भाजपा और आज की भाजपा के बीच बड़ी लकीर है जो भेद करने विवश करती है। अटल बेबाकी से स्वीकार करते थे कि आजादी के बाद भारत तेजी से आगे न सिर्फ बढ़ा बल्कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र को सदैव गौरवांवित होने अवसर पैदा करने जन्मदाता भी बना। अटल ने विपक्ष में रहते हुए सदैव कमियों को लेकर प्रहार भी किया और लोकतंत्र के प्रहरी भी बने पर स्वर्णिम इतिहास के वे पन्ने जिनसे भारत का निर्माण हुआ उनकी व्याख्या करना कभी न भूलें।
सरकार आई गईं,राजनीतिक परिदृश्य कई बार बदला भी,गिरकर बार बार संभलें भी। लाल किले की प्राचीर से अटल ललकारे भी और देश की आवाम को बातों बातों में नसीहत भी दी,समकालिक सरकारों की कमियां भी गिनाई और पीठ थपथपाकर अहसास भी कराया देश से बढ़कर कोई नही। संकटकाल में साथ भी खड़े हुए और भारत की गरिमा को हिमालयी ऊंचाई भी दी। यह वह दौर था जब भाजपा ने हिंदू और हिंदुत्व का मतलब भी बताया और सर्वधर्म समभाव की पैरवी भी की। हिंदू होने पर फक्र भी जताया और अन्य धर्मों के प्रति नफरत के ढोंग से भी परहेज किया।

वर्तमान भाजपा आधुनिक होकर खड़ी हुई जहां भगवा का जिक्र भी है और आरक्षण और जातिवाद के जिन्न के प्रभाव में चोटिल होता हिंदुत्व भी है मुस्लिम और इस्लाम से समानांतर दूरी भी है और तीन तलाक के अभिशाप से मुक्ति और इससे इतर गले लगाने की छटपटाहट भी। राम के आसरे रामराज्य के सपने भी है और भगवा रंग देश के नक्शे में भरने की जल्दबाजी के बीच नैतिकता पर पर्दा डालने की मजबूरी भी। आजादी के बाद की नाकामी भी जताना है पर उसी मजबूत आधार पर बहुमंजिला विकास की रफ्तार भी गिनाना है। एक तरफ अटल की पाठशाला का जिक्र है जिसे उनके विरोधी भी ग्रहण करने से नही चूकना चाहते थे और एक तरफ भाषणों में जिक्र उस सोने की चिड़िया का है जो आजाद तो है पर बंदिशें परतंत्र घोषित करती है। एक तरफ देश के लिए राजनीति का जोश, सम्मान,गरिमा,सुचिता,साहस,त्याग है दूसरी तरफ विचारधारा की जीत के लिए देश दांव पर लगाने की जिद,एक तरफ गौरवशाली इतिहास  बार बार कहता है देश नही इसके स्वर्णिम इतिहास को दोहराने की जरूरत है और एक तरफ देश बदलने लगातार जिक्र ??? कुर्सी ही सरकार है और सरकार के सत्ता में बने रहने का जुनून ,,,,,,,,,,,,अटल जी की पार्थिव देह पर सिसकियां भरने से अच्छा है अटल जी के व्यक्तित्व को विचारधारा का आधार बनाया जावें।

सांसे जिस्म छोड़ गई और जिस्म भी राख हो गया,
अटल थे,अटल है,अटल रहेंगें जो "भारत" हो गया।।

सादर नमन,,,,,,योगेश शर्मा,बनखेड़ी