रविवार, 26 जनवरी 2020

आपका राष्ट्रवाद,,,,राष्ट्रप्रेम,,,,,राष्ट्रभक्ति क्या हैं?



"जरूरी नहीं की गीता,कुरान,बाइबिल पर फूल चढ़ाकर माथा टेका जाएं,
जरूरत इस बात की हैं इन महान ग्रन्थों को आइना समझकर जीवन में उतारा जाएं।।"

राष्ट्रीय पर्व गणतंत्रता दिवस की सादर शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए अपनी बात शुरू करता  हूँ जिसे छात्रों एवं समाज को समझना बेहद जरूरी हैं। ऐसा मेरा मानना हैं। क्या वाकई हम अपने संविधान को समझने की स्थिति में भी नही हैं क्योंकि हमें समझाने वाले शायद तैयार नही हैं। देश की एकता एवं अखण्डता को अमर रखने सिर्फ नारों की नही बल्कि मजबूत इक्षाशक्ति की जरूरत हैं राष्ट्रीय तिरंगें झंडे के तीन रंगों के महत्व को समझने की जरूरत हैं जहां एक भी रंग को कम कर दिया जाए तो यह ध्वज अधूरा रहेगा। राष्ट्रीय गान जनगणमन के दौरान उस रोम रोम में उठने वाले उस अहसास को महसूस करने की हैं जो देशप्रेम की असीम ऊर्जा व जोश का संचार बढ़ा देती हैं।
" हरे रंग और भगवा के बीच का श्वेत रंग बना जाएं,
फिर गंगा और जमुना की तरह मिलकर दरिया को भरा जाएं।।"

 आजकल सोसल मीडिया पर तरह तरह के तर्क वितर्क अपनी बात मनवाने या सहूलियत के हिसाब से गढ़ दी जाने वाली अधूरी जानकारियां परोस दी जाती हैं और हम भी बगैर पड़ताल किये उसे सच मान लेते हैं। यही हाल इतिहास का हो चला हैं देश के शीर्ष नेतृत्व इतिहास को लेकर परस्पर द्वंद में उलझे हुए हैं और यही कारण हैं इतिहास की बहस में वर्तमान असंतुलित सा नजर आता हैं। यहां इस बात का ध्यान अवश्य रखना होगा भारत का इतिहास अनेकताओं में एकता के साथ विविधताओं के वावजूद एक सूत्र में बंधे रहने का अहसास कराता हैं जबकि वर्तमान परिदृश्य देखकर डर लगता हैं यदि एकता से अनेकता में बंटते चले गए तो इसके परिणाम भी खंड खंड होकर विकराल हो सकते हैं।
 जिम्मेदारी हमारी हैं युवाओं में देश का भविष्य हैं तो उस भविष्य के वर्तमान भी हम हैं। हम जिस जगह रहते हैं जिस जगह पैदा होते हैं और जो हमारी पीढ़ियों की कर्म स्थली है वह हमारी भारत माता हैं हमारा इसके प्रति चिंतन ही राष्ट्रप्रेम हैं फिर यहां के लिए हमारी क्या भूमिका हैं इसे तय करने की आवश्यकता हैं। जवाबदार नागरिक जिस दिन बनने की राह चुनेंगे राष्ट्रभक्ति उस दिन से शुरू हो जाएंगी। साक्षर हो जाना शिक्षित होने का सर्टिफिकेट तब तक नही माना जा सकता जब तक आप जागरूक नही होते। हमारे पूर्वजों को भले ही अक्षर ज्ञान कम रह गया हो पर उनका अनुभव उनका संघर्ष हमारे होने की नींव का पत्थर हैं। कुछ बेहतर करने से समाज,गांव का नाम रोशन होता हैं तो इस मंत्र को हम सब क्यों नही अपनाते आखिर क्यों हमारे जिम्मेदार स्वयं का ऐसा नही कर पाते जिससे नाम रोशन हो क्योंकि हम अवसरवाद के तले निजीहितों को ध्यान में रखकर अपनी राष्ट्रभक्ति तय करने लगें हैं।
देश की गौरवगाथा के किरदारों के योगदान और इतिहास  पर बहस की बजाय वर्तमान के धरातल पर हमारे नैतिक दायित्व पर आत्ममंथन करने की जरूरत हैं जरूरत हैं उस हकीकत को समझने की जिसमें जल,जंगल,जमीन,गाय,गंगा और इसके जुड़ी प्रकृति को सहेजने की मगर अफसोस हमारी बहस के मुद्दे कुछ और हैं जहां जिक्र रोजगार का भी नही हैं न युवा भविष्य का हैं न बात उन विषयों पर होती जिसमें गांव,कस्बे आत्मनिर्भर हों। खेल प्रतिभाएं हैं पर संसाधन नही है। तैरना चाहते हैं पर तैरने नदियों के घाट सुरक्षित नही है जानते हैं आत्मनिर्भर बनने स्वास्थ्य,शिक्षा,सड़क,आवागमन विकास का मूलमंत्र हैं पर आजादी के वर्षों बाद भी सक्षम बहस के यह मुद्दे ही नही हैं मेरा सवाल हैं मुझ जेंसे युवा के मन में चलता द्वंद राष्ट्रवाद नही तो क्या हैं ? तय आपको करना हैं आपका राष्ट्रवाद,राष्ट्रप्रेम,राष्ट्रहित क्या हैं। 

योगेश शर्मा,,,,,वंदे मातरम