शुक्रवार, 2 मार्च 2018

त्योहारों के मायने पीढ़ियों को सिखाने होंगे,,,

हिंदू धर्म के सभी त्योहारों का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व हैं होली के पर्व का मौसम से  गहरा ताल्लुक हैं। बसंत का यह मौसम उमंग,उत्साह से भरपूर होता हैं आने वाले समय की चुनोतियों को स्वीकार करने एवं जीवन जीतने जरूरी हैं मन  उमंग और उत्साह से लवरेज रहें। होली का पर्व जहां मेलजोल,सुख - दुःख को बांटने रंगों के जरिये निराशा भरे बदरंगो के गुम करने का पर्व हैं। युवा पीढ़ियों को यह जताने की जवाहदेही तय करेगी की इन त्योहारों और रंगों का भविष्य क्या होगा। आधुनिकता के दौर में सिमटता त्योहारों का दायरा सार्वजनिक सदभाव एवं क्षेत्रीय परम्पराओं को न समेट दें यह चिंत्तन किसी न किसी को तो करना ही होगा  पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा को  दायित्व समझकर निर्वहन करते रहना तभी संभव हैं जब लोक परम्पराओं के महत्व की समझ बरकरार रहें।
होलिका दहन,गुलाल,अबीर,फाग,अनरय,गुझा,पपड़ी जेंसे शब्द कही खो न जाएं क्योंकि इन शब्दों का आधुनिकता में खो जाना या शाब्दिक अर्थ बदल देना भी सनातन धर्म पर चोट ही होगी। उदाहरण के तौर पर रंगों में नकलीपन कही चरित्र में उतर गया तो परंपरागत त्यौहार भी गावँ से सिमटकर गलियों और गलियों से सिमटकर चार दिवारी में घुट से जॉयेंगे।

भांग की जगह शराब -

वैसे भी भांग का परंपरागत उन्माद शराब के उपद्रव में केंसे तब्दील हो गया और हम इस बदलाव के आदी होते  चले गए। परिवार या विरासतों के मिले जुले उत्सव से इतर शराब ही आंनद का पर्याय बनता चला गया इस बात को भले ही समाज नजरअंदाज करे पर सच तो यही हैं। बारीकी से समझे तो आदतन शराब खोरों के लिए होली जेंसे उत्सव सिर्फ इतने मायने रखते हैं कि हर रोज रात में शराब के प्याले गटके जाते हैं और होली पर दिन में।

गुजिया पपड़ियां की गुम होती महक -

सप्ताह भर पहले से गुझिया की महक और पपड़ियों की   जगह रेडीमेड मिठाई ने ले ली पर जरा सोचिए वक्त के बदलते मिजाज का हवाला भी वर्षों पुराने परम्परागत व्यंजनों का स्वाद नही बदल सका। आधुनिकता का अधूरापन गावँ में भी विपरीत असर छोड़ रहा हैं गावँ की गलियों के हुरियारे खो चले हैं जबकि शहरी अंचल में ये गुम होती परम्पराएं हाईटेक उत्सव में टीव्ही सीरियलों में कैद हो चली हैं जिन्हें शायद सिर्फ महसूस भर किया जा सकता हैं। यूँ कहे की हमारे जमाने का जिक्र कर बदलाव की आहट तो महसूस होती ही हैं।

संवाद जरूरी हैं-
पीढ़ी दर पीढ़ी कम होता संवाद डिप्रेशन,अकेला पन एवं मानसिक कमजोर करता हैं यह जानते हुए की अपनी विरासत को आगे बढ़ाने जरूरी हैं जमीनी हुनर भी आगे बढे। त्योहारों का महत्व भी कुछ यही संकेत देता हैं पीढ़ियों में संवाद स्थापित हो तो बात बन जाए फिर भांग की ठंडाई का उन्माद और शराब की लाचारी,रंगों का नशा,गुझिया,पपड़ियों का स्वाद और इन सबके बीच होली का अतिमहत्वपूर्ण त्योहारी किरदार  आने वाली पीढ़ियों को जरूर समझ आएगा।

योगेश शर्मा,बनखेड़ी

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